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Friday, August 7, 2026

सूतक/पातक विचार :

सूतक/पातक विचार :

सूतक/पातक विचार :

॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो नारायणाय ॥ ॥ ॐ नमः शिवाय ॥

सनातन वैदिक धर्म में शौच ( पवित्रता ) को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। 

ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में बाह्य एवं आंतरिक शुद्धि, संयम, यज्ञ, तप तथा सदाचार का विशेष महत्व बताया गया है। 

इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर धर्मशास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों में सूतक ( जन्म अशौच ) तथा पातक अथवा मृत्यु अशौच का विधान मिलता है।

हमारे ऊपर आ रहे कष्टो का एक  कारण सूतक के नियमो का पालन नहीं करना भी हो सकता है।

सूतक का सम्बन्ध “जन्म एवं मृत्यु  के” निम्मित से हुई अशुद्धि से है ! 

जन्म के अवसर पर जो ""नाल काटा"" जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष / पाप के प्रायश्चित स्वरुप “सूतक” माना जाता है !




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सूतक का अर्थ :

परिवार में किसी शिशु के जन्म के बाद जो अशौच काल माना जाता है, उसे सूतक कहते हैं। 

यह काल माता, पिता और निकट संबंधियों के लिए आत्मसंयम, विश्राम, शुद्धि और धार्मिक मर्यादा के पालन का समय माना गया है।

प्राचीन काल में इसका उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि नवजात शिशु और माता को संक्रमण से बचाना, पर्याप्त विश्राम देना तथा परिवार को नए सदस्य की देखभाल का अवसर प्रदान करना भी था।


जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता....! 

3 पीढ़ी तक – 10 दिन से सवा महीना तक ,

4 पीढ़ी तक – 10 दिन से  21 दिन तक , 

5 पीढ़ी तक – 6 दिन से  11 दिन तक ,


ध्यान दें :- एक रसोई में भोजन करने वालों के पीढ़ी नहीं गिनी जाती…! 

योग्य बात यह है कि सूतक - पातक किसी व्यक्ति के पाप या दोष का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह परिवार में जन्म या मृत्यु के पश्चात् निश्चित अवधि तक पालन किए जाने वाले धार्मिक एवं सामाजिक नियमों का नाम है। 

इस का उद्देश्य मन, शरीर, परिवार और समाज में शुद्धि, अनुशासन तथा आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखना है।

वहाँ पूरा 10 दिन का सूतक माना है !

प्रसूति ( नवजात की माँ ) को 45 दिन का सूतक रहता है 

प्रसूति स्थान 1 माह तक अशुद्ध है ! 

इसी लिए कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं !

+++ +++

शास्त्रीय आधार :

वेदों में शुद्धि, स्नान, आचमन, यज्ञ तथा पवित्र जीवन के सिद्धांत मिलते हैं। 

सूतक - पातक का विस्तृत विधान मुख्यतः धर्मशास्त्रों और स्मृतियों में मिलता है। 

मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति, गौतम धर्मसूत्र, आपस्तम्ब धर्मसूत्र, बौधायन धर्मसूत्र और वसिष्ठ धर्मसूत्र में जन्म एवं मृत्यु के बाद पालन किए जाने वाले नियमों का विस्तार से वर्णन है।

भविष्य पुराण, अग्नि पुराण, विष्णु पुराण, नारद पुराण तथा गरुड़ पुराण में भी शौच, अशौच, श्राद्ध, तर्पण और धार्मिक आचरण का महत्व बताया गया है। 


अपनी पुत्री :

पीहर में जनै तो हमे 3 दिन का, ससुराल में जन्म दे तो उन्हें 10 दिन का सूतक रहता है ! 

और हमे कोई सूतक नहीं रहता है !


नौकर - चाकर :

अपने घर में जन्म दे तो 1 दिन का, बाहर दे तो हमे कोई सूतक नहीं !

पालतू पशुओं का घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि को घर में बच्चा होने पर हमे 1 दिन का सूतक रहता है !

किन्तु घर से दूर - बाहर जन्म होने पर कोई सूतक नहीं रहता !

बच्चा देने वाली गाय, भैंस और बकरी का दूध, क्रमशः 15 दिन, 10 दिन और 8 दिन तक “अभक्ष्य/अशुद्ध” रहता है !




गर्भपात :

किसी स्त्री के यदि गर्भपात हुआ हो तो, जितने माह का गर्भ पतित हुआ....! 

उतने ही दिन का पातक मानना चाहिए....!

घर का कोई सदस्य ""तपस्वी' साधु सन्यासी""" बन गया हो तो, उस साधु सन्त को , उसे घर में होने वाले जन्म - मरण का सूतक - पातक नहीं लगता है ! 

किन्तु स्वयं उसका ही मरण हो जाने पर उसके घर वालों को 1 दिन का पातक लगता है !


पातक या मृत्यु अशौच :

परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु होने पर निश्चित अवधि तक जो अशौच माना जाता है, उसे मृत्यु अशौच या पातक कहा जाता है। 

इस अवधि में परिवार शोक, आत्मचिंतन, ईश्वर स्मरण तथा दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता है।

धर्मशास्त्र बताते हैं कि मृत्यु के बाद परिवार को सांसारिक उत्सवों से दूर रहकर दिवंगत आत्मा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिए।

सूतक - पातक का महत्व :

धर्मशास्त्रों के अनुसार इसका उद्देश्य किसी को अपवित्र घोषित करना नहीं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण संस्कारों के समय संयम और शुद्धि बनाए रखना है।

यह मन को स्थिर करता है, परिवार को एकजुट रखता है, धार्मिक अनुशासन सिखाता है और जीवन-मृत्यु के सनातन सत्य का स्मरण कराता है।

पातक :

पातक का सम्बन्ध “मरण के” निम्मित से हुई अशुद्धि से है !  

मरण के अवसर पर ""दाह - संस्कार"" में इत्यादि में जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष / पाप के प्रायश्चित स्वरुप “पातक” माना जाता है !

+++ +++

सूतक - पातक का महत्व :

धर्मशास्त्रों के अनुसार इसका उद्देश्य किसी को अपवित्र घोषित करना नहीं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण संस्कारों के समय संयम और शुद्धि बनाए रखना है।

यह मन को स्थिर करता है, परिवार को एकजुट रखता है, धार्मिक अनुशासन सिखाता है और जीवन - मृत्यु के सनातन सत्य का स्मरण कराता है।

सूतक - पातक के नियम :

धर्मशास्त्रों में वर्णित नियम स्थान, परंपरा, गोत्र और कुलाचार के अनुसार कुछ भिन्न हो सकते हैं, पर सामान्यतः निम्न नियम स्वीकार किए जाते हैं —

- जन्म अथवा मृत्यु के बाद निर्धारित अवधि तक धार्मिक संयम रखें।

- मंदिर में प्रवेश, यज्ञ, हवन और बड़े वैदिक अनुष्ठानों से विरत रहें।

- विवाह, गृहप्रवेश, उपनयन आदि मांगलिक कार्य स्थगित रखें।

- सात्त्विक भोजन करें।

- क्रोध, झूठ और विवाद से दूर रहें।

- प्रतिदिन स्नान करके ईश्वर का मानसिक स्मरण करें।

- शुद्धि के पश्चात ही सामान्य धार्मिक कार्य पुनः प्रारंभ करें।




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विशेष :

किसी अन्य की शवयात्रा में जाने वाले को 1 दिन का, मुर्दा छूने वाले को 3 दिन और मुर्दे को कन्धा देने वाले को 8 दिन की अशुद्धि जाननी चाहिए !

घर में कोई "आत्मघात "करले तो 6 महीने का पातक मानना चाहिए !

यदि कोई स्त्री अपने पति के मोह / निर्मोह से"आग लगाकर जल मरे," बालक पढाई में फेल होकर या कोई अपने ऊपर दोष देकर "आत्महत्या" कर  मरता है तो इनका पातक बारह पक्ष याने 6 महीने का होता है !

उसके अलावा भी कहा है कि जिसके घर में इस प्रकार "अपघात" होता है, वहाँ छह महीने तक कोई बुद्धिमान मनुष्य भोजन अथवा जल भी ग्रहण नहीं करता है ! 

वह मंदिर नहीं जाता और ना ही उस घर का द्रव्य मंदिर जी में चढ़ाया जाता है ! 

जहां आत्महत्या हुई है, उस घर का पानी भी ६ माह तक नहीं पीना चाहिए। 

एवं अनाचारी स्त्री - पुरुष के हर समय ही पातक रहता है।

क्या जप और ईश्वर स्मरण बंद करना चाहिए ?

नहीं। धर्मशास्त्रों में बाह्य धार्मिक अनुष्ठानों पर संयम का उल्लेख है, परंतु मानसिक जप, भगवान का स्मरण, ध्यान, प्रार्थना, गीता, रामायण या विष्णु सहस्रनाम का मन ही मन पाठ निषिद्ध नहीं माना गया।

ईश्वर का स्मरण हर परिस्थिति में शुभ है।

जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर का संबंध :

वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूतक - पातक का निर्णय ग्रहों की स्थिति से नहीं किया जाता। 

यह जन्म या मृत्यु की घटना पर आधारित धार्मिक व्यवस्था है।

हाँ, यदि सूतक या मृत्यु अशौच के समय किसी व्यक्ति की कुंडली में अशुभ दशा या कठिन गोचर चल रहा हो, तो ज्योतिषाचार्य मानसिक धैर्य, ईश्वर भक्ति, दान और संयम की सलाह दे सकते हैं। 

किंतु सूतक की अवधि ग्रहों से निर्धारित नहीं होती।

+++ +++

यह भी ध्यान से पढ़िए :

सूतक - पातक की अवधि में “देव - शास्त्र - गुरु” का पूजन, प्रक्षाल, आहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती हैं !

इन दिनों में मंदिर के उपकरणों को स्पर्श करने का भी निषेध है !  

यहाँ तक की गुल्लक में रुपया डालने का भी निषेध बताया है ! 

दान पेटी मे दान भी नहीं देना चाहिए।

देव - दर्शन, प्रदिक्षणा, जो पहले से याद हैं वो विनती / स्तुति बोलना....! 

भाव - पूजा करना....! 

हाथ की अँगुलियों पर जाप देना  शास्त्र सम्मत है !

कहीं कहीं लोग सूतक - पातक के दिनों में मंदिर ना जाकर इसकी समाप्ति के बाद मंदिरजी से गंधोदक लाकर शुद्धि के लिए घर - दुकान में छिड़कते हैं....! 

ऐसा करके नियम से घोनघोर पाप का बंध करते हैं ! 

मानो या न मानो....!

यह सत्य है....! 

नहीं मानने पर दुःख, कष्ट, तकलीफ....! 

होगी इन्हे समझना इस लिए ज़रूरी है....! 

ताकि अब आगे घर - परिवार में हुए जन्म - मरण के अवसरों पर अनजाने से भी कहीं दोष का उपार्जन ना हो।




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सूतक - पातक का आध्यात्मिक फल :

जो व्यक्ति श्रद्धा और मर्यादा से इन नियमों का पालन करता है, उसके भीतर धैर्य, विनम्रता और धर्म के प्रति सम्मान बढ़ता है। 

परिवार में अनुशासन और एकता आती है। 

मन शांत होता है और ईश्वर के प्रति आस्था दृढ़ होती है।

यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर धर्ममर्यादा का उपहास करे, बुजुर्गों की परंपराओं का अपमान करे या शोककाल में अनुचित व्यवहार करे, तो समाज और परिवार में अशांति उत्पन्न हो सकती है।

क्या सूतक - पातक सभी पर समान रूप से लागू होता है ?

धर्मशास्त्रों में निकट संबंधियों, दूर के संबंधियों, संन्यासियों, बालकों तथा विशेष परिस्थितियों के लिए अलग - अलग नियम बताए गए हैं। 

इस लिए केवल सामान्य नियम देखकर निर्णय नहीं करना चाहिए। 

कुलाचार और विद्वान आचार्य की सलाह लेना उचित रहता है।





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शुद्धि की विधि :

निर्धारित अवधि पूर्ण होने पर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें, घर की शुद्धि करें, देवस्थान की सफाई करें, गंगाजल का छिड़काव करें तथा भगवान की पूजा करके सामान्य धार्मिक जीवन पुनः प्रारंभ करें।

मृत्यु अशौच के पश्चात श्राद्ध, तर्पण और पितृ स्मरण का विशेष महत्व बताया गया है।

उपाय :

धर्मशास्त्रों और पुराणों के अनुसार निम्न उपाय शुभ माने गए हैं—

- भगवान श्री विष्णु, शिव और श्री गणेश का स्मरण करें।

- "ॐ नमो नारायणाय", "ॐ नमः शिवाय" अथवा अपने इष्ट मंत्र का मानसिक जप करें।

- श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2, 12 या 15 का पाठ करें।

- विष्णु सहस्रनाम या रामनाम का स्मरण करें।

- ब्राह्मण, गौ, निर्धन, रोगी और जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान दें।

- अन्नदान, वस्त्रदान और जलदान करें।

- पितरों की शांति के लिए श्रद्धा से तर्पण करें।

- परिवार में प्रेम, क्षमा और सद्भाव बनाए रखें।




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आधुनिक समय में पालन :

आज के समय में अस्पताल, नौकरी और सामाजिक परिस्थितियों के कारण सभी लोग प्राचीन नियमों का पूर्ण पालन नहीं कर पाते। 

फिर भी धर्म का सार यही है कि शुद्धता, संयम, श्रद्धा, शोक का सम्मान और ईश्वर स्मरण बना रहे। 

बाहरी परिस्थितियों के अनुसार व्यवहार बदल सकता है, किंतु धर्म का मूल भाव नहीं बदलता।

निष्कर्ष :

सूतक - पातक सनातन धर्म की एक प्राचीन और गंभीर व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य किसी को अपवित्र ठहराना नहीं, बल्कि जीवन के दो महान संस्कार — जन्म और मृत्यु — के प्रति श्रद्धा, अनुशासन और आध्यात्मिक जागरूकता बनाए रखना है।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद शुद्ध जीवन का आधार प्रदान करते हैं, जबकि धर्मशास्त्र, स्मृतियाँ और भविष्य पुराण, नारद पुराण, अग्नि पुराण तथा विष्णु पुराण इन नियमों का विस्तार से वर्णन करते हैं। 

जो व्यक्ति श्रद्धा, विवेक और शास्त्रसम्मत मर्यादा के साथ इन नियमों का पालन करता है, उसके जीवन में धार्मिक संतुलन, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः । सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 

+++ +++

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -

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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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