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Monday, January 5, 2026

गुरु की महादशा :

गुरु की महादशा :

गुरु की महादशा :

गुरु की महादशा, अंतरदशा, प्रत्यंतरदशा, सुदर्शन चक्र और योगिनी दशा का प्रभाव, महत्व, फल एवं उपाय !

भारतीय ज्योतिष परंपरा में गुरु अर्थात बृहस्पति को ज्ञान, धर्म, सदाचार, शिक्षा, संतान, विवाह, धन, भाग्य, आध्यात्मिकता, गुरु - कृपा और जीवन में विस्तार देने वाला प्रमुख ग्रह माना गया है।

जन्मकुंडली में गुरु की स्थिति को केवल एक ग्रह के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होता। 
गुरु किस राशि में है, किस भाव में है, किन ग्रहों से युति या दृष्टि संबंध है, किस नक्षत्र में है, उसकी 
अवस्था कैसी है और दशा - गोचर में उसका समय कब सक्रिय हो रहा है—

इन सभी बातों को एक साथ देखकर फलादेश करना अधिक उचित माना जाता है।

जाम खंभालिया गुजरात से ज्योतिषाचार्य  पंडारामा राज्यगुरू प्रभु वोरिया से जानिए विशोतरी और अष्टोत्तरी का गुरु की महादशा , गुरु की अंतर दशा , गुरु की प्रत्यंत दशा , गुरु का सुदर्शन चक्र , योगिनी दशा कैसा रह सकता है । 




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जन्मकुंडली में गुरु का मूल महत्व :

वैदिक ज्योतिष की दशा - पद्धतियों में विशेष रूप से विंशोत्तरी दशा अत्यंत प्रसिद्ध है। 

इस के अतिरिक्त अष्टोत्तरी दशा, योगिनी दशा तथा सुदर्शन चक्र जैसी प्रणालियों का भी प्रयोग परंपरागत ज्योतिषीय विश्लेषण में किया जाता है। 

इन प्रणालियों का उद्देश्य जीवन में किसी ग्रह या ग्रह - संबंधित कर्मफल के सक्रिय समय को समझना है।

गुरु को देवगुरु बृहस्पति कहा जाता है। 

कुंडली में बलवान और शुभ गुरु व्यक्ति को ज्ञान, विवेक, धार्मिक रुचि, अच्छे संस्कार, योग्य सलाहकार, उच्च शिक्षा, प्रतिष्ठा और जीवन में उचित मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है। 

गुरु की शुभता विवाह, संतान, आर्थिक स्थिति, सामाजिक सम्मान और भाग्य से जुड़े विषयों में भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।


लेकिन गुरु को केवल स्वभाव से शुभ ग्रह मानकर हर कुंडली में उसके परिणाम समान नहीं माने जा सकते। 

गुरु किस लग्न के लिए किन भावों का स्वामी है, यह बहुत महत्वपूर्ण है। 

उदाहरण के लिए किसी कुंडली में गुरु केंद्र या त्रिकोण के शुभ भावों का स्वामी होकर बलवान हो सकता है, जबकि दूसरी कुंडली में उसके स्वामित्व और स्थिति के कारण परिणाम अलग हो सकते हैं।


इसी लिए गुरु की महादशा का फल निकालते समय केवल “गुरु शुभ है” कहना पर्याप्त नहीं है।

जन्मकुंडली, भावाधिपत्य, राशि, नक्षत्र, दृष्टि, युति, नवांश तथा वर्तमान गोचर को साथ लेकर विचार करना चाहिए।

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अष्टोत्तरी दशा में गुरु :

अष्टोत्तरी दशा एक अन्य दशा प्रणाली है, जिसका प्रयोग विशेष परिस्थितियों और परंपरागत नियमों के अनुसार किया जाता है। 

इसे हर कुंडली में बिना विचार के लागू करना उचित नहीं माना जाता। 

अष्टोत्तरी दशा की पात्रता और उसके नियमों को देखकर ही उसका उपयोग करना चाहिए।


जब अष्टोत्तरी दशा में गुरु सक्रिय होता है, तब उसकी जन्मकुंडलीगत स्थिति के अनुसार शिक्षा, ज्ञान, धन, संतान, धर्म, सलाह, प्रतिष्ठा और आध्यात्मिक विषय सक्रिय हो सकते हैं। 

यदि गुरु पीड़ित हो तो वही अवधि जिम्मेदारियों, आर्थिक विवेक की परीक्षा या पारिवारिक निर्णयों से संबंधित अनुभव भी दे सकती है।


योगिनी दशा में गुरु से संबंधित प्रभाव :

योगिनी दशा अपेक्षाकृत अलग प्रकृति की दशा प्रणाली है। 

इस में आठ योगिनियों के माध्यम से समय का विश्लेषण किया जाता है। 

इस लिए योगिनी दशा में “गुरु की महादशा” कहना तकनीकी रूप से विंशोत्तरी की तरह सीधा नहीं है। 

यहाँ संबंधित योगिनी और उसके स्वामी ग्रह के माध्यम से गुरु से जुड़े परिणामों को समझना अधिक उचित है।


यदि योगिनी दशा का सक्रिय ग्रह गुरु से संबंध रखता हो, गुरु को देखता हो, गुरु के भाव को सक्रिय करता हो या गोचर गुरु उसी समय महत्वपूर्ण स्थिति बना रहा हो, तो गुरु के कारकत्व वाले विषय फलित होने की संभावना बढ़ सकती है।

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विंशोत्तरी दशा में गुरु की महादशा :

विंशोत्तरी दशा में गुरु की महादशा की अवधि 16 वर्ष मानी जाती है। 

यह जीवन का लंबा कालखंड होता है, इस लिए इसके भीतर शिक्षा, विवाह, संतान, नौकरी, व्यवसाय, धन, आध्यात्मिकता और सामाजिक प्रतिष्ठा से संबंधित अनेक घटनाएँ घट सकती हैं।


यदि गुरु जन्मकुंडली में मजबूत, शुभ भावों से संबंधित और शुभ ग्रहों से प्रभावित हो, तो उसकी महादशा में ज्ञान और विकास के अवसर बढ़ सकते हैं। 

उच्च शिक्षा, अध्यापन, सलाहकारी कार्य, धार्मिक गतिविधियाँ, प्रतिष्ठा, आर्थिक विस्तार तथा पारिवारिक सुख के अवसर मिल सकते हैं।


यदि गुरु कमजोर, पीड़ित या अशुभ भावों से संबंधित हो, तो उसी महादशा में ज्ञान के साथ भ्रम, आर्थिक निर्णयों में गलती, पारिवारिक मतभेद, शिक्षा में रुकावट या अपेक्षाओं के विपरीत परिणाम भी संभव माने जाते हैं।


गुरु की अंतरदशा :

महादशा के भीतर चलने वाली अंतरदशा यह बताने में सहायता करती है कि उस बड़े कालखंड के अंदर किस ग्रह का प्रभाव अधिक सक्रिय है। 

गुरु की अंतरदशा यदि किसी शुभ ग्रह की महादशा में आती है और गुरु कुंडली में बलवान है, तो शिक्षा, विवाह, संतान, धन, पद, प्रतिष्ठा अथवा आध्यात्मिक उन्नति से जुड़े विषय सक्रिय हो सकते हैं।


गुरु की अंतरदशा का सही फल जानने के लिए यह देखना चाहिए कि गुरु जन्मकुंडली में किन भावों का स्वामी है और किन भावों में स्थित है। 

साथ ही गुरु की दृष्टि किन भावों पर पड़ रही है, यह भी महत्वपूर्ण है।


यदि गुरु छठे, आठवें या बारहवें भाव से मजबूत रूप से संबंधित हो, तो उसकी अंतरदशा में सेवा, ऋण, रोग, संघर्ष, शोध, गुप्त विषय, विदेश, खर्च या आध्यात्मिक परिवर्तन जैसे विषय भी सामने आ सकते हैं। 

इस लिए हर परिणाम को केवल शुभ या अशुभ की एक श्रेणी में रखना उचित नहीं है।




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गुरु की प्रत्यंतर दशा :

अंतरदशा के भीतर प्रत्यंतर दशा और अधिक सूक्ष्म समय निर्धारण में उपयोगी मानी जाती है। 

जब गुरु की प्रत्यंतर दशा चलती है, तब जन्मकुंडली में गुरु से संबंधित विषय अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय हो सकते हैं।


उदाहरण के लिए गुरु यदि दशम भाव, दशमेश या कर्म से मजबूत संबंध रखता है, तो गुरु की प्रत्यंतर दशा में नौकरी या व्यवसाय संबंधी घटना का समय सक्रिय हो सकता है। 

यदि गुरु पंचम भाव और संतान से संबंधित हो, तो संतान या शिक्षा के विषय सामने आ सकते हैं। 

यदि सप्तम भाव से संबंध हो, तो विवाह और साझेदारी के विषय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।


हालाँकि किसी निश्चित घटना की भविष्यवाणी केवल प्रत्यंतर दशा देखकर नहीं करनी चाहिए। 

दशा, गोचर और जन्मकुंडली के योगों का एक साथ समर्थन होना अधिक महत्वपूर्ण है।

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गुरु का सुदर्शन चक्र :


सुदर्शन चक्र पद्धति में कुंडली के विभिन्न भावों और ग्रहों के प्रभाव को एक विशेष चक्रीय दृष्टिकोण से देखा जाता है। 

इस में लग्न, चंद्र लग्न और सूर्य लग्न से बनने वाले संकेतों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है।

इस का उद्देश्य किसी समय विशेष में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की सक्रियता को समझना है।

गुरु जब सुदर्शन चक्र के विश्लेषण में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है, तब उसके कारकत्व से जुड़े विषयों—

ज्ञान, धर्म, संतान, शिक्षा, धन, गुरु, सलाह, सम्मान और विस्तार—

को विशेष ध्यान से देखा जाता है।

यदि जन्मकुंडली और सुदर्शन चक्र दोनों किसी विषय की पुष्टि करते हों तथा उसी समय गुरु का गोचर भी उसका समर्थन करता हो, तो फलादेश को अधिक मजबूत आधार मिल सकता है।

गुरु का गोचर और दशा का संबंध :

दशा अकेले घटना नहीं बनाती और गोचर अकेले भी हर घटना की पूर्ण व्याख्या नहीं करता। 

परंपरागत फलित ज्योतिष में दशा और गोचर की संयुक्त पुष्टि को विशेष महत्व दिया जाता है।

यदि गुरु की महादशा चल रही हो और गोचर गुरु जन्मकुंडली के किसी शुभ भाव को सक्रिय कर रहा हो, तो शिक्षा, विवाह, संतान, धन, नौकरी, व्यवसाय या धार्मिक गतिविधियों में विस्तार की संभावना देखी जा सकती है।

इस के विपरीत यदि दशा में गुरु कमजोर हो और गोचर भी प्रतिकूल भावों को सक्रिय करे, तो व्यक्ति को निर्णयों में सावधानी, अनावश्यक खर्च से बचाव और धैर्य रखने की आवश्यकता हो सकती है।

गुरु के शुभ फल : 


बलवान गुरु की दशा में परंपरागत रूप से निम्न क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम देखे जाते हैं—

शिक्षा में प्रगति, उच्च ज्ञान, योग्य गुरु या मार्गदर्शक की प्राप्ति, विवाह के अवसर, संतान संबंधी सुख, आर्थिक विस्तार, धार्मिक रुचि, समाज में सम्मान, सलाहकारी क्षमता, आध्यात्मिक विकास तथा जीवन में सही दिशा मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

गुरु का विशेष महत्व यह है कि वह केवल भौतिक वृद्धि का संकेत नहीं देता, बल्कि विवेक और जीवन-दृष्टि के विकास का भी कारक माना जाता है।
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गुरु कमजोर हो तो क्या करें ?

गुरु कमजोर या पीड़ित होने पर उपाय करने से पहले उसकी वास्तविक स्थिति समझना आवश्यक है। 
हर व्यक्ति को एक ही उपाय बताना उचित नहीं है। 

जन्मकुंडली में गुरु के स्वामित्व, स्थिति और ग्रह संबंधों को देखकर उपाय निर्धारित करना चाहिए।

परंपरागत रूप से गुरुवार को गुरुजनों का सम्मान करना, योग्य व्यक्ति को शिक्षा या ज्ञान से संबंधित सहायता देना, धार्मिक एवं सात्त्विक जीवन अपनाना, असत्य और छल से बचना तथा जरूरतमंद विद्यार्थियों की सहायता करना गुरु के सकारात्मक सिद्धांतों के अनुरूप माना जा सकता है।

गुरु मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप, बृहस्पति से संबंधित पूजा तथा अपनी परंपरा के अनुसार दान भी किए जाते हैं। 

लेकिन रत्न धारण जैसे उपाय बिना कुंडली देखे नहीं करने चाहिए, क्योंकि गुरु किसी विशेष लग्न में शुभ और दूसरे लग्न में अलग भूमिका निभा सकता है।

गुरु की दशा में पालन करने योग्य नियम :


गुरु की दशा में सबसे महत्वपूर्ण नियम है—

ज्ञान का सम्मान करें और अहंकार से बचें। 

गुरु का सिद्धांत व्यक्ति को सही सलाह स्वीकार करने, धर्म और कर्तव्य के बीच संतुलन रखने तथा ज्ञान को व्यवहार में उतारने की प्रेरणा देता है।

बिना जानकारी के बड़े आर्थिक निर्णय न लेना, झूठे वादों से बचना, शिक्षकों और वरिष्ठों का अपमान न करना, संतान और परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाना तथा धर्म के नाम पर अंधविश्वास से बचना भी व्यवहारिक रूप से महत्वपूर्ण है।

अंततः गुरु की महादशा, अंतरदशा, प्रत्यंतरदशा, अष्टोत्तरी, योगिनी दशा, सुदर्शन चक्र और गोचर—

इन सभी को एक साथ पढ़ना चाहिए। किसी एक दशा या एक ग्रह के आधार पर जीवन की पूरी भविष्यवाणी करना उचित नहीं है।
गुरु जीवन में ज्ञान, विवेक, विस्तार, धर्म, संतान, शिक्षा और मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण प्रतीक है। 

उसकी दशा व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय ला सकती है जिसमें सीखने, बढ़ने, जिम्मेदारी लेने और जीवन को नई दिशा देने के अवसर मिलें।

परंतु वास्तविक फल गुरु की प्राकृतिक शुभता से अधिक उसकी जन्मकुंडलीगत स्थिति, भावाधिपत्य, राशि, नक्षत्र, दृष्टि, युति, बल, दशा - अंतरदशा, प्रत्यंतरदशा और गोचर पर निर्भर करता है।

इस लिए गुरु की महादशा को केवल धन या भाग्य की अवधि मानना उचित नहीं है। 

यह ज्ञान की परीक्षा, सही निर्णय लेने, गुरुजनों से सीखने, परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य निभाने तथा आध्यात्मिक रूप से विकसित होने का भी महत्वपूर्ण काल हो सकता है।

भारतीय ज्योतिषीय परंपरा का मूल संदेश यही माना जा सकता है कि ग्रह केवल संकेत देते हैं; मनुष्य का विवेक, कर्म, अनुशासन और आचरण भी उसके जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

गुरु की वास्तविक कृपा तभी सार्थक होती है जब ज्ञान केवल पुस्तकों में न रहकर व्यवहार, सेवा, सत्य, सदाचार और उचित कर्म में दिखाई दे।

इस प्रकार विंशोत्तरी और अष्टोत्तरी दशा, योगिनी दशा, सुदर्शन चक्र तथा गोचर का समन्वित अध्ययन करके गुरु के समय का अधिक सूक्ष्म और संतुलित फलादेश किया जा सकता है। 

श्रद्धा के साथ विवेक, उपाय के साथ कर्म और ज्योतिषीय संकेतों के साथ वास्तविक परिस्थितियों का विचार—

यही गुरु तत्व को समझने का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है।
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गुरु की महादशा का अनुभव आधारित फल :

जन्मपत्रिका में गुरु यदि पीडित, अकारक, अस्त, पापी अथवा केन्द्राधिपति से दूषित हो तो इसकी दशा में अग्रांकित फल प्राप्त होते हैं। 

यहां मैं पुनः कहता हु की यह फल देखने से पहले आप समस्त प्रकार से यह जांच कर लें कि आपकी
में गुरु की क्या स्थिति है ? 

यह फल आपको तभी प्राप्त होंगे जब गुरु उपरोक्त स्थिति में होगा। 

साथ ही यह भी देखें कि गुरु के साथ किस ग्रह की युति है या किस ग्रह की दष्टि है अथवा गुरु की राशि में कौन सा ग्रह विराजमान है ? 

शुभ ग्रह, लग्नेश या कारक ग्रह की युति अथवा दृष्टि होने पर गुरु के अशुभ फल में निश्चय ही कमी
आयेगी। 
"जैसा मैंने गुरु के लिये कहा कि यह अपना फल अधिकतर शुभ ही देते है."

परन्तु किसी भी रूप से उपरोक्त स्थिति में होने पर इनके अशुभ फल का रौद्र रूप अच्छे से अच्छे व्यक्ति को भयभीत कर देता है। 

यह अपने कारकत्व भाव में अकेला होने पर कारकत्व दोष से दूषित होते हैं तथा केन्द्र में केन्द्राधिपति दोष से पीड़ित होते है। 

इस लिये यह इन स्थिति के अतिरिक्त पूर्ण रूप से पापी अथवा पीड़ित हो तो इनकी महादशा में तथा इस के साथ इनकी ही अन्तर्दशा में निम्नानुसार फल प्राप्त होते हैं।

मुख्यतः 


गुरु पत्रिका में वृषभ, मिथुन अथवा कन्या राशि में हो अथवा किसी नीच ग्रह के प्रभाव में हो अथवा गुरु की किसी राशि में कोई नीच या पापी ग्रह बैठा हो अथवा गुरु स्वयं नीचत्व को प्राप्त हो तो जातक को दुर्घटना, अग्नि भय, मानसिक कष्ट या प्रताड़ना, राजदण्ड, आकस्मिक पीड़ा अथवा किसी बड़ी चोरी से हानि का भय होता है। 

इस के अतिरिक्त गुरु किसी त्रिक भाव में हो अथवा त्रिक भाव के स्वामी के साथ हो तो जातक को अत्यन्त कष्ट प्राप्त होते हैं। 

इस में भी यदि इन भावों का स्वामी कोई पाप ग्रह हो तो फिर अशुभ फल की कोई सीमा नहीं होती है। 

नीचे मैं कई स्थान पर दोनों ग्रह ( गुरु तथा जिसका प्रत्यन्तर हो ) के अशुभ योग होने पर अशुभ फल की चर्चा करूंगा। 

उस में आप यह अवश्य देख लें कि उस स्थिति में कोई शुभ ग्रह प्रभाव दे रहा है ? 

यदि शुभ की दृष्टि अथवा युति हो तो अवश्य ही अशुभ फल में कमी आयेगी। 

आने वाली कमी का रूप शुभ ग्रह की शक्ति पर निर्भर करेगा। 

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इस के अतिरिक्त गुरु की महादशा में गुरु का अन्तर शुभ फल नहीं देता है, इसमें यदि।


1 गुरु द्वितीय भाव में हो तो अवश्य ही राजकीय दण्ड अथवा आर्थिक हानि होती है।

2 गुरु तृतीय अथवा एकादश भाव में अकेला हो तो जातक को पश्चिम दिशा की यात्रा अथवा अन्य कष्ट होते हैं।

3 गुरु यदि किसी केन्द्र भाव में हो तो जातक को राजदण्ड अथवा उच्चाधिकारी के कोप के साथ शारीरिक कष्ट होते हैं तथा मान सम्मान में कमी अथवा संतान पक्ष से पीड़ा होती है।

4 गुरु किसी त्रिकोण में हो तो व्यक्ति को स्त्री वर्ग से कष्ट, राजकीय प्रताड़ना तथा कार्यों में अवरोध के साथ अग्नि या दुर्घटना भय होता है।

5 यदि गुरु किसी त्रिक भाव अर्थात् 6 - 8 अथवा 12 भाव में हो तो व्यक्ति को मानसिक कष्ट के साथ अन्य कष्ट भी प्राप्त होते हैं।

6 गुरु यदि तृतीय अथवा एकादश भाव में शनि के साथ हो तो अवश्य शुभ फल प्राप्त होते हैं। 

इस में भी यदि शनि लग्नेश हो तो फिर शुभ फल की कोई सीमा ही नहीं होती है।

7 गुरु के मारकेश होने पर अर्थात् द्वितीय अथवा सप्तम भाव का स्वामी होने पर जातक को स्वयं मृत्यु तुल्य कष्ट अथवा जीवनसाथी को कष्ट प्राप्त होते हैं।

क्रमशः...अगले लेख में गुरु की महादशा में अन्य ग्रहों की अंतर्दशा से मिलने वाले फलों के विषय मे चर्चा करेंगे।



समयाभाव के कारण कृपया पोस्ट पर किसी प्रकार के शंका समाधान की अपेक्षा ना रखें। 

गुरु के द्वारा होने वाले रोग :


गुरु एक आकाश तत्वीय ग्रह है। 

गुरु का हमारे शरीर में चरबी, उदर, यकृत, त्रिदोष में विशेषकर कफ पर तथा रक्त वाहिनियों पर अधिकार रहता है। 


गुरु को वैदिक ज्योतिष शास्त्र  में संतानकारक ग्रह माना गया है। 

जिनकी पत्रिकाओं में गुरु शुभ स्थिति में होता है, वह जातक सदैव इन रोगों से दूर रहता है। 

वह अच्छे विचार का, शारीरिक रूप से हृष्ट - पुष्ट तथा मानसिक रूप से बहुत बली होता है। 

पत्रिका में गुरु यदि पापी अथवा किसी पाप ग्रह से पीड़ित हो तो जातक इन रोगों के अतिरिक्त कर्ण व दंत रोग, अस्थि मज्जा में विकार, वायु विकार, अचानक मूर्छा आ जाना, ज्वार, आंतो की शल्य क्रिया, रक्त विकार के साथ मानसिक कष्ट तथा ऊंचे स्थान से गिरने का भय होता न इन रोगों के साधारणतः गुरु के 4 - 6 - 8 अथवा 12वें भाव में होने पर गोचरवश इन भावों में आने पर ही होने की सम्भावना अधिक होती है। 





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इस के साथ ही ऐसा भी आप न समझें कि यदि आपकी पत्रिका में गुरु पापी है तो यही रोग होंगे। 

रोगों में मुख्य बात यह भी होती है कि गुरु किस भाव किस राशि में स्थित है ? 

यहा पर हम पत्रिका में गुरु किस राशि में होने पर की सम्भावना अधिक होती है, इसकी चर्चा करेंगे। 

आप अपनी पत्रिका में पापी होने पर तुरन्त ही इस निर्णय पर न पहुंच जायें कि आपको यह रोग दोगा आप किसी भी निष्कर्ष पर जाने से पहले अपनी पत्रिका में अन्य योग अवश्य ही होगा, आप किसी भी देख लें।

मेष राशि में गुरु के होने पर जातक को शिरो रोग अधिक होते हैं। 

यदि इस योग में गुरु पर मंगल अथवा केतू की दृष्टि हो तो किसी दुर्घटना में सिर में बड़ी चोट का योग बन सकता है।

वृषभ राशि में गुरु के प्रभाव से जातक को मुख, कण्ठ, श्वसन तंत्रिका तथा आहार नली में संक्रमण का भय होता है। 

यदि गुरु लग्न में इस राशि में हो तो व्यक्ति के जीवनसाथी को मूत्र संस्थान का संक्रमण तथा स्वयं को उदर विकार की सम्भावना होती है। 

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गुरु के पीड़ित अवस्था में ही यह रोग होते हैं, लेकिन मेरे अनुभव में गुरु पीड़ित हो अथवा नहीं, लेकिन इस राशि में वह वाणी विकार के साथ मुख रोग अवश्य देता है।

मिथुन राशि में गुरु व्यक्ति के कंधों व बांहों पर अधिक कष्ट देता है। 

बुध भी यदि पीड़ित हो तो त्वचा विकार तथा रक्त विकार का योग अधिक बन जाता है। 

यदि गुरु अथवा बुध पर कोई पाप ग्रह का प्रभाव हो तो जातक के 32 वें वर्ष में किसी दुर्घटना में हाथ कटने का योग भी बन जाता है। 

यहां पर गुरु का बहुत ही अधिक पीड़ित तथा बुध का लग्नेश न होने पर ही यह योग घटित होता है।


कर्क राशि में गुरु के होने पर जातक को फेफड़ों के रोग, छाती तथा पाचन क्रिया पर असर आता है। 

मैंने देखा है कि यदि गुरु अधिक पीड़ित हो तथा चन्द्र के साथ चतुर्थ भाव व उसका स्वामी भी पीड़ित हो तो जातक कम आयु से ही रक्तचाप का रोगी तथा हृदयाघात का योग अवश्य बनता है। 

यदि लग्न भी कर्क ही हो तो जातक मानसिक कष्ट अधिक पाता है। 

उसे खाने - पीने के मामले में सावधानी रखनी चाहिये। 


अगर केवल चन्द्र व गुरु ही पीड़ित हों तो जातक को गर्मी के मौसम में शरीर में पानी की कमी के कारण कुछ समय अस्पताल में बिताना पड़ता है। 

इस लिये ऐसे जातकों को गर्मी के मौसम में पानी का सेवन अधिक करना चाहिये अन्यथा उसको गर्मी के कारण अचानक मूर्छा आ सकती है।

सिंह राशि में यदि गुरु है तो जातक को उदर विकार के साथ हृदयाघात का भी भय रहता है तथा गर्मी में ऐसे जातक को भी उपरोक्त समस्या आ सकती।

कन्या राशि में गुरु के होने पर व्यक्ति आंतों के संक्रमण तथा पेट में जलन से अधिक परेशान रहता है।

 

यदि मंगल की दृष्टि हो तो जातक को आंतों की भी क्रिया अथवा अपेन्डिक्स जैसे आपरेशन भी हो सकते हैं। 

यदि गुरु के साथ शुक्र भी विराजमान हो तो नपुंसकता अथवा शीघ्रपतन का भय रहता है। 

यदि शनि की दृष्टि आये तो भी यह रोग तो होना ही है।

तुला राशि में गुरु मूत्र विकार, जनन अंग, गुदा रोग तथा कमर के दर्द परेशान करता है। 

जातक को शीघ्रपतन का रोग अधिक होता है। 

यहां पर मेरा अनुभव है कि इस राशि में गुरु यह रोग देता अवश्य है लेकिन अधिक बली होने की स्थिति में, गुरु यदि सामान्य बली है तो यह रोग कम होते हैं । 





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अगर लग्न भी तुला है तो फिर गुरु जितना कम बली होगा, जातक के लिये उतना ही अच्छा है। 

यदि किसी उपरोक्त स्थिति में रोग हो तो वह किसी के भी कहने से गुरु रत्न को धारण न करे
अन्यथा इन रोगों को तो बल मिलेगा ही साथ ही अस्थि भंग का भी योग निर्मित होगा। 

इस स्थिति में गुरु को पूजा - पाठ से शान्त करना उचित होता है, क्योंकि इस लग्न में गुरु जितना अधिक कमजोर होगा, जातक को उतना ही अधिक लाभ मिलेगा।

वृश्चिक राशि में गुरु के होने पर व्यक्ति का पाचन संस्थान खराब रहता है। 

मुख्यत: कब्ज अधिक होती है। 


खट्टी डकार, आहार नली में जलन भी रहती है। 

गुदा रोग भी अधिक होते हैं। 

गुदा रोग भी कब्ज के ही कारण होते हैं। 

यदि मंगल की दृष्टि यहां हो तो फिर गुदा की दो बार शल्य क्रिया तो सामान्य बात है।


धनु राशि में गुरु कमर से निचले हिस्से में अधिक समस्या देता है जिसमें दर्द, स्नायु विकार अथवा संधिवात जैसे रोग होते हैं। 

इस राशि में गुरु यदि लग्न भाव में होता है तो समस्या और अधिक गम्भीर होती है, हालांकि गुरु यहां लग्नेश होता है लेकिन फिर भी वह यदि किसी दुःस्थान में है तो जातक बहुत शारीरिक कष्ट उठाता
है। 

ऐसे जातकों को खानपान सादा तथा कम करना चाहिये।

मकर राशि में गुरु जातक को कमर तथा पैरों के दर्द से जीवन भर समस्या देता है। 

उसे दीर्घकालीन रोग होते हैं तथा उसके घुटने तो 30 वर्ष की आयु से ही खराब होने लगते हैं। 

स्नायुविकार का योग भी होता है। 

यदि शनि की यहां दृष्टि हो तो रोग कम होते हैं लेकिन पीड़ा तो झेलनी ही होती है।

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कुंभ राशि भी शनि की राशि है। 

गुरु के इस राशि में होने पर जातक का कमर से नीचे का हिस्सा बहुत ही कमजोर होता है। 

उसे उदर रोग व वायु विकार के साथ स्नायुविकार भी होता है। 

मैंने इस योग पर अनुभव किया है कि ऐसे जातक घुटने की समस्या से अधिक पीड़ित रहते हैं। 

यदि यह योग अष्टम भाव में शनि से द्रष्ट हो तो जातक को 35 वर्षायु में बायें घुटने से विकलांगता आती है।

मीन राशि का स्वामी स्वयं गुरु है, इस लिये इस राशि में गुरु के होने से जातक के शरीर में रोग प्रतिकारक क्षमता काफी कम होती है। 

वह मामूली संक्रमण में भी अधिक बीमार होता है। 

ऐसे जातक को उदर रोग, पाचन रस व लार का कम निर्माण तथा थोड़ा ही भोजन करने पर अपच के साथ कण्ठ में जलन जैसी समस्या अधिक आती है। 

इस लिये ऐसे जातको को भोजन अधिक चबा - चबा कर खाना चाहिये। 

बीच - बीच में पानी का प्रयोग भी करना चाहिये। 

गुरु के लग्न भाव में होने पर यह रोग कम होते हैं।

क्रमशः...

अगले लेख में हम रोग भाव मे गुरु के बैठने पर गुरु प्रदत्त विशेष रोगों के विषय मे चर्चा करेंगे।


समयाभाव के कारण कृपया पोस्ट पर किसी प्रकार के शंका समाधान की अपेक्षा ना रखें। 

गुरु जनित रोगों से मुक्ति के विशेष एवं विस्तृत उपाय अंतिम लेखों के माध्यम से सांझा करेंगे।

न भारतीयो नववत्सरोSयं
 तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् ।
यतो धरित्री निखिलैव माता
 तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।।

यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।

”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:”
अतः पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।

पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।।

* मान मिले सम्मान मिले,खुशियों का वरदान मिले. *
 क़दम-क़दम पर मिले सफलता,डगर-डगर उत्थान मिले. * 
सूरज रोज संवारे दिन को,चाँद मधुर सपने ले आये, * 
हर पल समय दुलारे तुमको,सदियों तक पहचान मिले..... ~!!!

 पाश्चात्य नववर्ष की बहुत बहुत मंगलकामनाये ... 
/\ ॐ नमः शिवाय 
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