कृष्ण और शुक्ल पक्ष :
कैसे शुरू हुए कृष्ण और शुक्ल पक्ष :
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्र, वेदाङ्ग ज्योतिष, जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली एवं गोचर के ग्रहों के अनुसार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का महत्व, नियम, फल एवं वैदिक उपाय !
पंचांग के अनुसार हर माह में तीस दिन होते हैं और इन महीनों की गणना सूरज और चंद्रमा की गति के अनुसार की जाती है।
चन्द्रमा की कलाओं के ज्यादा या कम होने के अनुसार ही महीने को दो पक्षों में बांटा गया है जिन्हे कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष कहा जाता है।
पूर्णिमा से अमावस्या तक बीच के दिनों को कृष्णपक्ष कहा जाता है, वहीं इसके उलट अमावस्या से पूर्णिमा तक का समय शुक्लपक्ष कहलाता है।
दोनों पक्ष कैसे शुरू हुए उनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं।
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कृष्ण और शुक्ल पक्ष से जुड़ी कथा :
इस तरह हुई कृष्णपक्ष की शुरुआत :
भारतीय सनातन संस्कृति में समय की गणना केवल दिन, सप्ताह और वर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक तिथि, पक्ष, नक्षत्र और ग्रह का अपना विशेष आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय महत्व है।
चन्द्रमा की कलाओं के आधार पर प्रत्येक मास दो भागों में विभाजित होता है—
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
वेदाङ्ग ज्योतिष, धर्मशास्त्र, पुराणों तथा वैदिक परंपरा में इन दोनों पक्षों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना गया है।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी सत्ताईस बेटियों का विवाह चंद्रमा से कर दिया।
ये सत्ताईस बेटियां सत्ताईस स्त्री नक्षत्र हैं और अभिजीत नामक एक पुरुष नक्षत्र भी है।
लेकिन चंद्र केवल रोहिणी से प्यार करते थे।
ऐसे में बाकी स्त्री नक्षत्रों ने अपने पिता से शिकायत की कि चंद्र उनके साथ पति का कर्तव्य नहीं निभाते।
दक्ष प्रजापति के डांटने के बाद भी चंद्र ने रोहिणी का साथ नहीं छोड़ा और बाकी पत्नियों की अवहेलना करते गए।
तब चंद्र पर क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति ने उन्हें क्षय रोग का शाप दिया।
क्षय रोग के कारण सोम या चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे कम होता गया।
कृष्ण पक्ष की शुरुआत यहीं से हुई।
कृष्ण पक्ष क्या है?
पूर्णिमा के बाद चन्द्रमा की कलाएँ धीरे-धीरे क्षीण होने लगती हैं और अमावस्या तक यह क्रम चलता है।
इसे कृष्ण पक्ष कहते हैं।
यह आत्मचिंतन, साधना, वैराग्य, पितृकार्य, दोष - निवारण, तप, ध्यान तथा आध्यात्मिक उन्नति का समय माना जाता है।
ऐसे शुरू हुआ शुक्लपक्ष :
शुक्ल पक्ष क्या है ?
अमावस्या के अगले दिन से चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ने लगती हैं।
यह अवधि पूर्णिमा तक रहती है और इसे शुक्ल पक्ष कहा जाता है।
यह वृद्धि, प्रकाश, समृद्धि, उत्साह, ज्ञान, आरंभ, विवाह, मांगलिक कार्य तथा देवपूजन का प्रतीक माना जाता है।
कहते हैं कि क्षय रोग से चंद्र का अंत निकट आता गया।
वे ब्रह्मा के पास गए और उनसे मदद मांगी। तब ब्रह्मा और इंद्र ने चंद्र से शिवजी की आराधना करने को कहा।
शिवजी की आराधना करने के बाद शिवजी ने चंद्र को अपनी जटा में जगह दी।
ऐसा करने से चंद्र का तेज फिर से लौटने लगा।
इससे शुक्ल पक्ष का निर्माण हुआ।
चूंकि दक्ष ‘प्रजापति’ थे।
चंद्र उनके शाप से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकते थे।
शाप में केवल बदलाव आ सकता था।
इस लिए चंद्र को बारी - बारी से कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में जाना पड़ता है।
दक्ष ने कृष्ण पक्ष का निर्माण किया और शिवजी ने शुक्ल पक्ष का।
कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के बीच अंतर :
जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर में चन्द्रमा की स्थिति मन, बुद्धि, भावनाओं, निर्णय क्षमता, परिवार, माता तथा आध्यात्मिक उन्नति का प्रतिनिधित्व करती है।
इस लिए कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का प्रभाव जीवन के अनेक क्षेत्रों में दिखाई देता है।
जब हम संस्कृत शब्दों शुक्ल और कृष्ण का अर्थ समझते हैं, तो हम स्पष्ट रूप से दो पक्षों के बीच अंतर कर सकते हैं।
शुक्ल उज्ज्वल व्यक्त करते हैं, जबकि कृष्ण का अर्थ है अंधेरा।
जैसा कि हमने पहले ही देखा, शुक्ल पक्ष अमावस्या से पूर्णिमा तक है, और कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष के विपरीत, पूर्णिमा से अमावस्या तक शुरू होता है।
वैदिक ज्योतिष में महत्व :
वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा को मन का स्वामी कहा गया है।
यदि जन्मकुंडली में चन्द्रमा बलवान हो तो व्यक्ति मानसिक रूप से स्थिर, दयालु, लोकप्रिय और सुखी होता है।
यदि चन्द्रमा कमजोर हो तो चिंता, अस्थिरता, भय, भ्रम तथा निर्णय लेने में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।
शुक्ल पक्ष में जन्म लेने वाले जातकों में सामान्यतः उत्साह, सकारात्मक सोच, विकास की इच्छा तथा समाज में आगे बढ़ने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है।
कृष्ण पक्ष में जन्म लेने वाले जातक प्रायः गंभीर, चिंतनशील, आध्यात्मिक, शोधप्रिय तथा अंतर्मुखी स्वभाव के हो सकते हैं।
किंतु अंतिम फल सदैव सम्पूर्ण जन्मकुंडली के आधार पर ही निर्धारित होता है।
कौन सा पक्ष शुभ है ?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, लोग शुक्ल पक्ष को आशाजनक और कृष्ण पक्ष को प्रतिकूल मानते हैं।
यह विचार चंद्रमा की जीवन शक्ति और रोशनी के संबंध में है।
प्रश्नकुंडली में प्रभाव :
यदि किसी महत्वपूर्ण प्रश्न के समय शुक्ल पक्ष चल रहा हो तथा चन्द्रमा शुभ ग्रहों से प्रभावित हो तो कार्य की सफलता की संभावना बढ़ जाती है।
यदि कृष्ण पक्ष में प्रश्न पूछा गया हो तो परिणाम में विलंब, पुनर्विचार, बाधा अथवा पहले सुधार करने की आवश्यकता का संकेत मिल सकता है।
फिर भी यदि शुभ योग हों तो सफलता संभव रहती है।
गोचर में महत्व :
भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष की दशमी से लेकर कृष्ण पक्ष की पंचम तिथि तक की अवधि ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ मानी जाती है।
शुक्ल पक्ष के शुभ कार्य :
- विवाह एवं सगाई
- गृह प्रवेश
- नया व्यापार प्रारम्भ
- वाहन या भूमि खरीदना
- शिक्षा प्रारम्भ करना
- यज्ञ एवं शुभ संस्कार
- धन निवेश
कृष्ण पक्ष के श्रेष्ठ कार्य :
- श्रीहनुमानजी का पूजन
- पितरों का तर्पण
- ग्रह शांति
- महामृत्युंजय जप
- ध्यान एवं योग
- दान-पुण्य
- आत्मचिंतन
इस समय के दौरान चंद्रमा की ऊर्जा अधिकतम या लगभग अधिकतम होती है - जिसे ज्योतिष में शुभ और अशुभ समय तय करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
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ग्रहों के अनुसार प्रभाव :
सूर्य मजबूत हो तो दोनों पक्षों में आत्मबल बना रहता है।
चन्द्रमा शुभ हो तो मानसिक शांति, पारिवारिक सुख और सम्मान मिलता है।
मंगल शुभ हो तो साहस, भूमि और विजय प्राप्त होती है।
बुध शुभ हो तो बुद्धि, शिक्षा और व्यापार में लाभ होता है।
गुरु शुभ हो तो धर्म, संतान, ज्ञान और भाग्य का विकास होता है।
शुक्र शुभ हो तो सुख, दाम्पत्य, कला और ऐश्वर्य मिलता है।
शनि शुभ हो तो परिश्रम का उचित फल और स्थिर सफलता मिलती है।
राहु एवं केतु शुभ स्थिति में हों तो शोध, आध्यात्मिकता और विशेष उपलब्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं, अन्यथा भ्रम और मानसिक तनाव बढ़ सकता है।
आध्यात्मिक महत्व :
शुक्ल पक्ष हमें बाहर की उन्नति का संदेश देता है, जबकि कृष्ण पक्ष भीतर की यात्रा का अवसर प्रदान करता है।
एक पक्ष कर्म का है तो दूसरा आत्मनिरीक्षण का।
दोनों मिलकर जीवन को संतुलित बनाते हैं।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी समय और साधना के महत्व का वर्णन किया है।
पुराणों में पूर्णिमा को भगवान विष्णु तथा अमावस्या को पितरों एवं भगवान शिव की आराधना विशेष फलदायी बताई गई है।
वैदिक नियम :
- प्रतिदिन प्रातः सूर्य को अर्घ्य दें।
- सोमवार को भगवान शिव का पूजन करें।
- पूर्णिमा पर भगवान विष्णु एवं श्रीलक्ष्मी की पूजा करें।
- अमावस्या पर पितरों का स्मरण करें।
- चन्द्रमा के लिए दूध, चावल एवं सफेद वस्तुओं का दान करें।
- माता-पिता और गुरु का सम्मान करें।
- सत्य, संयम और सदाचार का पालन करें।
वैदिक उपाय :
- ॐ सोम सोमाय नमः मंत्र का 108 बार जप करें।
- सोमवार का व्रत रखें।
- शिवलिंग पर जल एवं कच्चा दूध अर्पित करें।
- पूर्णिमा को श्रीसत्यनारायण भगवान की कथा सुनें या कराएँ।
- अमावस्या पर तिल, अन्न, वस्त्र और दीपदान करें।
- गरीब एवं जरूरतमंद लोगों की सेवा करें।
- गौ सेवा एवं पक्षियों को अन्न खिलाएँ।
- प्रतिदिन कम से कम 11 मिनट ध्यान करें।
फल :
जो व्यक्ति समय के अनुसार उचित कर्म करता है, उसे मानसिक शांति, स्वास्थ्य, धन, परिवार में सुख, कार्यों में सफलता, आध्यात्मिक उन्नति तथा ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली तथा गोचर का सम्यक् विचार करके किए गए कार्य अधिक शुभ फल प्रदान करते हैं।
कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष केवल चन्द्रमा की घटती - बढ़ती कलाएँ नहीं हैं, बल्कि जीवन के दो महत्वपूर्ण आयाम हैं।
शुक्ल पक्ष हमें विकास, प्रकाश, उत्साह और शुभ कार्यों की प्रेरणा देता है, जबकि कृष्ण पक्ष आत्मशुद्धि, साधना, पितृश्रद्धा और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाता है।
वैदिक ज्योतिष का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि समय, ग्रहों और कर्म के समन्वय से जीवन को श्रेष्ठ बनाना है।
अतः जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर का विवेकपूर्ण अध्ययन कर, उचित समय पर शुभ कर्म, ईश्वर भक्ति, दान, जप, तप और सेवा करने वाला व्यक्ति जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।
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भारतीय वैदिक ज्योतिष मे कृतिका नक्षत्र के जातक :
कृत्तिका नक्षत्र राशि फल में 26.40 से 40.00 अंशों के मध्य स्थित है।
कृत्तिका के पर्यायवाची नाम हैं- हुताशन, अग्नि, बहुला अरबी में इसे अथ थुरेया' कहते हैं।
इस नक्षत्र में छह तारों की स्थिति मानी गयी है।
देवता अग्नि एवं स्वामी गुरु सूर्य है।
कृत्तिका प्रथम चरण मेष राशि ( स्वामी : मंगल ) एवं शेष तीन चरण वृष राशि ( स्वामी: शुक्र ) में आते हैं।
गणः राक्षस, योनिः मेष एवं नाड़ी: अंत है।
चरणाक्षर हैं: अ, इ, उ, ए ।
कृत्तिका नक्षत्र में जन्मे जातक मध्यम कद, चौड़े कंधे तथा सुगठित मांसपेशियों वाले होते हैं।
ऐसे जातक अत्यंत बुद्धिमान, अच्छे सलाहकार, आशावादी कठिन परिश्रमी तथा एक तरह हठी भी होते हैं।
वे वचन के पक्के तथा समाज की सेवा भी करना चाहते हैं।
वे येन - केन - प्रकारेण अर्थ, यश नहीं प्राप्त करना चाहते, न तो अवैध मागों का अवलंबन करते हैं, न किसी की दया' पर आश्रित रहना चाहते हैं।
उनमें अहं कुछ अधिक होता हैं, फलतः वे अपने किसी भी कार्य में कोई त्रुटि नहीं देख पाते।
वे परिस्थितियों के अनुसार ढलना नहीं जानते।
तथापि ऐसे जातक का • सार्वजनिक जीवन यशस्वी होता है।
लेकिन अत्यधिक ईमानदारी भरा व्यवहार उनके पतन का कारण बन जाता है।
ऐसे जातकों को सत्तापक्ष से लाभ मिलता है।
वे चिकित्सा या इंजीनियरिंग के अलावा ट्रेजरी विभाग में भी सफल हो सकते हैं, विशेषकर सूत निर्यात, औषध या अलंकरण वस्तुओं के व्यापार में सामान्यतः जन्मभूमि से दूर ही उनका उत्कर्ष होता है।
ऐसे जातकों का वैवाहिक जीवन सुखी बीतता है।
पत्नी गुणवती, गृह कार्य में दक्ष तथा सुशील होती है।
प्रायः उनकी पत्नी उनके परिवार की पूर्व परिचित ही होती है।
प्रेम विवाह के भी सकेत मिलते हैं।
ऐसे जातकों का स्वास्थ्य भी सामान्यतः ठीक ही रहता है तथापि उन्हें दंत - पीडा, नेत्र - विकार, क्षय, बवासीर आदि रोग जल्दी ही पकड़ सकते हैं।
कृतिका नक्षत्र में जन्मी जातिकाएं मध्यम कद की बहुत रूपवती तथा साफ - सफाई पसंद होती हैं।
वे अनावश्यक रूप से किसी से दबना' पसंद नहीं करतीं, फलतः जाने - अनजाने उनका स्वभाव कलह पैदा करने वाला बन जाता है।
उनमें संगीत, कला के प्रति रुचि होती है तथा वे शिक्षिका का कार्य बखूबी कर सकती हैं।
कृत्तिका के प्रथम चरण में जन्मी जातिकाएं उच्च अध्ययन में सफल होती हैं तथा प्रशासक, चिकित्सक, इंजीनियर आदि भी बन सकती हैं।
कृत्तिका नक्षत्र में जन्मी जातिकाओं का वैवाहिक जीवन पूर्णतः सुखी नहीं रह पाता।
पति से विलगाव या कभी-कभी प्रजनन क्षमता की हीनता भी इसका एक कारण हो सकती है।
कृत्तिका के विभिन्न चरणों के स्वामी इस प्रकार हैं: प्रथम एवं चतुर्थ चरण- गुरु, द्वितीय एवं तृतीय चरण-शनि।
क्रमशः... आगे के लेख मे रोहिणी नक्षत्र के विषय मे विस्तार से वर्णन किया जाएगा।
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शनि के नक्षत्र में सूर्य का गोचर, 2 हफ्ते इन 3 राशियों को हो सकती है धनहानि :
हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!!
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

