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Monday, June 29, 2026

बुध प्रदोष , कुंडली मे कमजोर बुध , अस्त ग्रह , :

बुध प्रदोष , कुंडली मे कमजोर बुध , अस्त ग्रह :

बुध प्रदोष व्रत परिचय एवं विस्तृत विधि :

प्रत्येक चन्द्र मास की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने का विधान है. यह व्रत कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों को किया जाता है। 

सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 मिनट का समय प्रदोष काल के नाम से जाना जाता है। 

प्रदेशों के अनुसार यह बदलता रहता है. सामान्यत: सूर्यास्त से लेकर रात्रि आरम्भ तक के मध्य की अवधि को प्रदोष काल में लिया जा सकता है।

ऐसा माना जाता है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है।

जिन जनों को भगवान श्री भोलेनाथ पर अटूट श्रद्धा विश्वास हो, उन जनों को त्रयोदशी तिथि में पडने वाले प्रदोष व्रत का नियम पूर्वक पालन कर उपवास करना चाहिए।

यह व्रत उपवासक को धर्म, मोक्ष से जोडने वाला और अर्थ, काम के बंधनों से मुक्त करने वाला होता है। 

इस व्रत में भगवान शिव की पूजन किया जाता है। 

भगवान शिव कि जो आराधना करने वाले व्यक्तियों की गरीबी, मृ्त्यु, दु:ख और ऋणों से मुक्ति मिलती है।





प्रदोष व्रत की महत्ता :

शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दौ गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है।

प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि " एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. तथा व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यो को अधिक करेगा।

उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म - जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है।


व्रत से मिलने वाले फल :

अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ प्राप्त होते है।

जैसे सोमवार के दिन त्रयोदशी पडने पर किया जाने वाला वर्त आरोग्य प्रदान करता है। 

सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोइच्छा की पूर्ति होती है। 

जिस मास में मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो, उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थय लाभ प्राप्त होता है एवं बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपवासक की सभी कामना की पूर्ति होने की संभावना बनती है।

गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिये किया जाता है।

शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख - शान्ति के लिये किया जाता है। 

अंत में जिन जनों को संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए। 

अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है।




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व्रत विधि :

सुबह स्नान के बाद भगवान शिव, पार्वती और नंदी को पंचामृत और जल से स्नान कराएं। 

फिर गंगाजल से स्नान कराकर बेल पत्र, गंध, अक्षत (चावल), फूल, धूप, दीप, नैवेद्य ( भोग ), फल, पान, सुपारी, लौंग और इलायची चढ़ाएं। 

फिर शाम के समय भी स्नान करके इसी प्रकार से भगवान शिव की पूजा करें। 

फिर सभी चीजों को एक बार शिव को चढ़ाएं।

और इसके बाद भगवान शिव की सोलह सामग्री से पूजन करें। 

बाद में भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। 

इस के बाद आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। 

जितनी बार आप जिस भी दिशा में दीपक रखेंगे, दीपक रखते समय प्रणाम जरूर करें। 

अंत में शिव की आरती करें और साथ ही शिव स्त्रोत, मंत्र जाप करें। 

रात में जागरण करें।


प्रदोष व्रत समापन पर उद्धापन :

इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।


उद्धापन करने की विधि :

इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए। 

इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है।

इस व्रत का उद्धापन करने के लिये त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है। 

उद्धापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है।

पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. प्रात: जल्द उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों या पद्म पुष्पों से सजाकर तैयार किया जाता है। 

"ऊँ उमा सहित शिवाय नम:" मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए, हवन किया जाता है।

हवन में आहूति के लिये खीर का प्रयोग किया जाता है।

हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है। 

और शान्ति पाठ किया जाता है. अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है। 

तथा अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशिर्वाद प्राप्त किया जाता है।




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बुध प्रदोष व्रत :

सूत जी आगे बोले- “बुध त्रयोदशी प्रदोष व्रत से सर्व कामनाएं पुर्ण होती हैं। 

इस व्रत में हरी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए । 

शंकर भगवान की आराधना धूप, बेल - पत्रादि से करनी चाहिए।


” व्रत कथा : "

एक पुरुष का नया - नया विवाह हुआ । 

विवाह के दो दिनों बाद उसकी पत्‍नी मायके चली गई । 

कुछ दिनों के बाद वह पुरुष पत्‍नी को लेने उसके यहां गया । 

बुधवार जो जब वह पत्‍नी के साथ लौटने लगा तो ससुराल पक्ष ने उसे रोकने का प्रयत्‍न किया कि विदाई के लिए बुधवार शुभ नहीं होता । 

लेकिन वह नहीं माना और पत्‍नी के साथ चल पड़ा । 

नगर के बाहर पहुंचने पर पत्‍नी को प्यास लगी । 

पुरुष लोटा लेकर पानी की तलाश में चल पड़ा । 

पत्‍नी एक पेड़ के नीचे बैठ गई । 

थोड़ी देर बाद पुरुष पानी लेकर वापस लौटा उसने देखा कि उसकी पत्‍नी किसी के साथ हंस - हंसकर बातें कर रही है और उस के लोटे से पानी पी रही है ।

उसको क्रोध आ गया । 

वह निकट पहुंचा तो उसके आश्‍चर्य का कोई ठिकाना न रहा । 

उस आदमी की सूरत उसी की भांति थी । 

पत्‍नी भी सोच में पड़ गई । 

दोनों पुरुष झगड़ ने लगे । 

भीड़ इकट्ठी हो गई । 

सिपाही आ गए । 

हम शक्ल आदमियों को देख वे भी आश्‍चर्य में पड़ गे । 

उन्होंने स्त्री से पूछा ‘उसका पति कौन है ?’ 

वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई । 

तब वह पुरुष शंकर भगवान से प्रार्थना करने लगा-

‘हे भगवान! हमारी रक्षा करें। 

मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने सास - श्‍वशुर की बात नहीं मानी और बुधवार को पत्‍नी को विदा करा लिया । 

' मैं भविष्य में ऐसा कदापि नहीं करूंगा।’ 

जैसे ही उसकी प्रार्थना पूरी हुई, दूसरा पुरुष अन्तर्धान हो गया। 

पति - पत्‍नी सकुशल अपने घर पहुंच गए। 

उस दिन के बाद से पति - पत्‍नी नियम पूर्वक बुध त्रयोदशी प्रदोष व्रत रखने लगे।

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प्रदोषस्तोत्रम् :

।। श्री गणेशाय नमः।।

जय देव जगन्नाथ जय शङ्कर शाश्वत । 

जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ॥ १॥


जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद ।

जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय ॥ २॥


जय विश्वैकवन्द्येश जय नागेन्द्रभूषण ।

जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर ॥ ३॥


जय कोट्यर्कसङ्काश जयानन्तगुणाश्रय । 

जय भद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरञ्जन ॥ ४॥


जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन । 

जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ॥ ५॥


प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः । 

सर्वपापक्षयं कृत्वा रक्ष मां परमेश्वर ॥ ६॥


महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च । 

महाशोकनिविष्टस्य महारोगातुरस्य च ॥ ७॥


ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः । 

ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शङ्कर ॥ ८॥


दरिद्रः प्रार्थयेद्देवं प्रदोषे गिरिजापतिम् । 

अर्थाढ्यो वाऽथ राजा वा प्रार्थयेद्देवमीश्वरम् ॥ ९॥


दीर्घमायुः सदारोग्यं कोशवृद्धिर्बलोन्नतिः ।

ममास्तु नित्यमानन्दः प्रसादात्तव शङ्कर ॥ १०॥


शत्रवः संक्षयं यान्तु प्रसीदन्तु मम प्रजाः । 

नश्यन्तु दस्यवो राष्ट्रे जनाः सन्तु निरापदः ॥ ११॥


दुर्भिक्षमरिसन्तापाः शमं यान्तु महीतले । 

सर्वसस्यसमृद्धिश्च भूयात्सुखमया दिशः ॥ १२॥


एवमाराधयेद्देवं पूजान्ते गिरिजापतिम् । 

ब्राह्मणान्भोजयेत् पश्चाद्दक्षिणाभिश्च पूजयेत् ॥ १३॥


सर्वपापक्षयकरी सर्वरोगनिवारणी । 

शिवपूजा मयाऽऽख्याता सर्वाभीष्टफलप्रदा ॥ १४॥

॥ इति प्रदोषस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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कथा एवं स्तोत्र पाठ के बाद महादेव जी की आरती करें :

ताम्बूल, दक्षिणा, जल -आरती :

तांबुल का मतलब पान है। 

यह महत्वपूर्ण पूजन सामग्री है। 

फल के बाद तांबुल समर्पित किया जाता है। 

ताम्बूल के साथ में पुंगी फल ( सुपारी ), लौंग और इलायची भी डाली जाती है । 

दक्षिणा अर्थात् द्रव्य समर्पित किया जाता है। 

भगवान भाव के भूखे हैं। 

अत: उन्हें द्रव्य से कोई लेना - देना नहीं है। 

द्रव्य के रूप में रुपए, स्वर्ण, चांदी कुछ भी अर्पित किया जा सकता है।

आरती पूजा के अंत में धूप, दीप, कपूर से की जाती है। 

इस के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। 

आरती में एक, तीन, पांच, सात यानि विषम बत्तियों वाला दीपक प्रयोग किया जाता है।

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भगवान शिव जी की आरती :

ॐ जय शिव ओंकारा,भोले हर शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ हर हर हर महादेव...॥


एकानन चतुरानन पंचानन राजे।

हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥


दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।

तीनों रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥


अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।

चंदन मृगमद सोहै भोले शशिधारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥


श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥


कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।

जगकर्ता जगभर्ता जगपालन करता ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥


ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥


काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।

नित उठि दर्शन पावत रुचि रुचि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥


लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा ।

पार्वती अर्धांगनी, शिवलहरी गंगा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।


पर्वत सौहे पार्वती, शंकर कैलासा।

भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।


जटा में गंगा बहत है, गल मुंडल माला।

शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ।। ॐ हर हर हर महादेव..।।


त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ हर हर हर महादेव..॥


ॐ जय शिव ओंकारा भोले हर शिव ओंकारा

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा ।। ॐ हर हर हर महादेव।।

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कर्पूर आरती :

कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।

सदावसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि॥


मंगलम भगवान शंभू

मंगलम रिषीबध्वजा ।

मंगलम पार्वती नाथो

मंगलाय तनो हर ।।

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मंत्र पुष्पांजलि :

मंत्र पुष्पांजली मंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है। 

भाव यह है कि इन पुष्पों की सुगंध की तरह हमारा यश सब दूर फैले तथा हम प्रसन्नता पूर्वक जीवन बीताएं।


ॐ यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।

ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा:


ॐ राजाधिराजाय प्रसह्ये साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे स मे कामान्कामकामाय मह्यम् कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु।


कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नम:

ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं माहाराज्यमाधिपत्यमयं समंतपर्यायी सार्वायुष आंतादापरार्धात्पृथिव्यै समुद्रपर्यंता या एकराळिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुत: परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन्गृहे आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवा: सभासद इति।


ॐ विश्व दकचक्षुरुत विश्वतो 

मुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात 

संबाहू ध्यानधव धिसम्भत 

त्रैत्याव भूमी जनयंदेव एकः।


ॐ तत्पुरुषाय विद्महे 

महादेवाय धीमहि 

तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥


नाना सुगंध पुष्पांनी यथापादो भवानीच

पुष्पांजलीर्मयादत्तो रुहाण परमेश्वर

ॐ भूर्भुव: स्व: भगवते श्री सांबसदाशिवाय नमः। मंत्र पुष्पांजली समर्पयामि।।

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प्रदक्षिणा :

नमस्कार, स्तुति - प्रदक्षिणा का अर्थ है परिक्रमा। 

आरती के उपरांत भगवन की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा हमेशा क्लॉक वाइज (clock-wise) करनी चाहिए। 

स्तुति में क्षमा प्रार्थना करते हैं, क्षमा मांगने का आशय है कि हमसे कुछ भूल, गलती हो गई हो तो आप हमारे अपराध को क्षमा करें।

यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च। तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे - पदे।।

अर्थ: जाने अनजाने में किए गए और पूर्वजन्मों के भी सारे पाप प्रदक्षिणा के साथ - साथ नष्ट हो जाए।

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कुंडली मे कमजोर बुध से उत्पन्न परेशानियां एवं निवारण :

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बुध अपनी बड़ी महत्व पूर्ण भूमिका निभाता है और हमारे जीवन के बहुत विशेष घटकों को नियंत्रित करता है। 

बुध का रंग हरा है वर्ण वैश्य है बुध मिथुन और कन्या राशि का स्वामी है कन्या राशि बुध की उच्च राशि भी है और मीन राशि में बुध नीचस्थ अर्थात सबसे कमजोर होता है, शनि, शुक्र और राहु बुध के मित्र ग्रहहैं और गोचरवश बुध किसी भी राशि में लगभग एक माह रहता है।

बुध आपकी जुबान, बर्ताव, आपके दिमाग और आपकी खूबसूरती का कारक ग्रह है. कुंडली में बुध की स्थति तय करती है कि आप कैसा बोलते हैं, कैसा व्यवहार करते हैं, आपका व्यक्तित्व और बुद्धि कैसी है।

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बुध का महत्व और विशेषताएं :

बुध को ग्रहों में सबसे सुकुमार और सुन्दर ग्रह माना जाता है। 

ज्योतिष में बुध को युवराज ग्रह भी कहते हैं। 

कन्या और मिथुन राशी का स्वामी बुध है और इसका तत्व पृथ्वी है। 

ज्योतिष में बुध को वैसे तो बुद्धि, तर्कशक्ति, निर्णय क्षमता, याददास्त, सोचने समझने की क्षमता,वाणी, बोलने की क्षमता, उच्चारण, व्यव्हार कुशलता, सूचना, संचार, यातायात, व्यापार, वाणिज्य, गणनात्मक विषय, लेखन, त्वचा, सौंदर्य और सुगंध, कम्युनिकेशन और गहन अध्ययन का कारक माना गया है इसके अतिरिक्त कान, नाक, गले और संचार से भी बुध का संबंध है।

गणितीय और आर्थिक मामलों में कामयाबी भी दिलाता है।

और ये सभी घटक हमारे जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं विशेषतः बुद्धि क्षमता की तो आज के समय में सर्वाधिक और हरजगह आवश्यकता होती है।

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बुध से बुद्धि, वाणी और एकाग्रता की समस्या :

यदि कुंडली में बुध नीच राशि ( मीन ) में हो, छटे या आठवे भाव में स्थित हो, केतु या मंगल से पीड़ित हो, सूर्य के साथ समान अंशपर होने से पूर्ण अस्त हो, षष्टेश अष्टमेश से पीड़ित हो या अन्य किसी भी प्रकार जब बुध बहुत कमजोर या पीड़ित हो ऐसे में व्यक्ति को मष्तिष्क से जुडी समस्यायें और तंत्रिका तंत्र संबंधित रहती हैं।

इसके प्रभाव से आपको लगने लगता है की आपकी सोचने और समझने की शक्ति कमजोर है। 

कोई भी फैसला लेने में आपको वक्त लगता है और आपका ध्यान भी बार - बार भटकता है तो हो सकता है कि आपका बुध कमजोर हो।

बुध कमजोर हो तो इंसान अपनी बुद्धि का सही प्रयोग नहीं कर पाता।

ऐसे इंसान को कोई भी चीज देर से समझ आती है और वह अक्सर दुविधा में ही रहता है।

बुध कमजोर हो तो इंसान ठीक से बोल नहीं पाता, कभी कभी हकलाहट भी होती है।

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बुध से बुद्धि, वाणी और एकाग्रता की समस्याओं के उपाय :

रोज सुबह तुलसी के पत्तों का सेवन करें। 

इस के बाद 108 बार 'ॐ ऐं सरस्वतयै नमः' का जाप करें।

हर बुधवार को गणेश जी को दूर्वा चढ़ाएं और इस दूर्वा को अपने पास रखें।

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बुध के कारण त्वचा की समस्या :

कमजोर बुध कभी - कभी त्वचा से जुड़ी समस्याएं भी देता है। 

कमजोर बुद्ध से एलर्जी, दाने और खुजली की समस्या होती है। 

सूर्य का प्रभाव हो तो त्वचा पर दाग-धब्बे पड़ जाते हैं। 

मंगल का भी प्रभाव हो तो त्वचा झुलस सी जाती है। 

राहु का योग हो तो विचित्र तरह की त्वचा की समस्या होती है।

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बुध से कान, नाक और गले की समस्या के उपाय :

रोज सुबह गायत्री मंत्र का जाप करें या मन में दोहराएं।

चांदी के चौकोर टुकड़े पर "ऐं" लिखवाकर गले में पहनें।

ज्यादा से ज्यादा हरे कपड़े पहनें।

रोज सुबह स्नान के बाद पीला चन्दन माथे, कंठ और सीने पर लगाएं।

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कमजोर बुध से गणित से जुड़े विषयों की समस्या :

कई बार पढ़ाई - लिखाई में कड़ी मेहनत करने के बावजूद कुछ लोग गणित और इससे जुड़े विषयों में कमजोर ही रह जाते हैं. ज्योतिष के जानकारों की मानें तो इसका कारण कमजोर बुध हो सकता है।

बुध कमजोर हो तो गणित या गणित से जुड़े विषयों में समस्या होती है। 

गणित से मिलते जुलते विषय जैसे - अकाउंट्स, इकोनॉमिक्स या सांख्यिकी में भी दिक्कत होती है।

इंसान को बार - बार इन विषयों में नाकामी का सामना करना पड़ता है।

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कमजोर बुध के चलते गणित से जुड़ी समस्याओं के उपाय :

अपनी इच्छा से ही गणित से जुड़े विषय चुनें, जबरदस्ती नहीं।

रोज सुबह और शाम "ॐ बुं बुधाय नमः" मंत्र का जाप करें। 

अपने पढ़ने की जगह पर कोई हरे रंग की देव प्रतिमा लगाएं। 

एवं खाने में थोड़ी सी हरी मिर्च का प्रयोग जरूर करें।

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अस्त ग्रह और उनके अनुभव आधारित फल :

ज्योतिष शास्त्र में अस्त ग्रह के परिणामों की बहुत लंबी व्याख्या मिलती है। 

अस्तग्रहों के बारे में यह कहा जाता है : “ त्रीभि अस्तै भवे ज़डवत ”,अर्थात् किसी जन्मपत्रिका में तीन ग्रहों के अस्त हो जाने पर व्यक्ति ज़ड पदार्थ के समान हो जाता है। 

ज़ड से तात्पर्य यहां व्यक्ति की निष्क्रियता और आलसीपन से है अर्थात् ऎसा व्यक्ति स्थिर बना रहना चाहता है, उसके शरीर, मन और वचन सभी में शिथिलता आ जाती है।

कहा जाता है कि ग्रहों के निर्बल होने में उनकी अस्तंगतता सबसे ब़डा दोष होता है। 

अस्त ग्रह अपने नैसर्गिक गुणों को खो देते हैं, बलहीन हो जाते हैं और यदि वह मूल त्रिकोण या उच्चा राशि में भी हों तो भी अच्छे परिणम देने में असमर्थ रहते हैं। 

ज्योतिष शास्त्र में एक अस्त ग्रह की वही स्थिति बन जाती है जो एक बीमार, बलहीन और अस्वस्थ राजा की होती है।

यदि कोई अस्त ग्रह नीच राशि, दु:स्थान, बालत्व दोष या वृद्ध दोष, शत्रु राशि या अशुभ ग्रह के प्रभाव में हो तो ऎसा अस्त ग्रह, ग्रह कोढ़ में खाज का काम करने लगता है। 

उसके फल और भी निकृष्ट मिलने लगते हैं अत: किसी कुण्डली के फल निरूपण में अस्तग्रह का विश्लेषण अवश्य कर लेना चाहिए।

अस्त ग्रह की दशान्तर्दशा में कोई गंभीर दुर्घटना, दु:ख या बीमारी आदि हो जाती है। 

जब किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में कोई शुभ ग्रह यथा बृहस्पति, शुक्र, चंद्र, बुध आदि अस्त होते हैं तो अस्तंगतता के परिणाम और भी गंभीर रूप से मिलने लगते हैं। 

कई कुण्डलियों में तो देखने को मिलता है कि किसी एक शुभ ग्रह के पूर्ण अस्त हो जाने मात्र से व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही अभावग्रस्त हो जाता है और परिणाम किसी भी रूप में आ सकते हैं जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाना, किसी पैतृक संपत्ति का नष्ट हो जाना, शरीर का कोई अंग - भंग हो जाना या किसी परियोजना में भारी हानि होने के कारण भारी धनाभाव हो जाना आदि। 

यह भी देखा जाता है कि यदि कोई ग्रह अस्त हो परंतु वह शुभ भाव में स्थित हो जाए अथवा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो अस्तग्रह के दुष्परिणामों में कमी आ जाती है।

यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में लग्नेश अस्त हो और इस अस्त ग्रह पर से कोई पाप ग्रह संचार करे तो फल अत्यंत प्रतिकूल मिलते हैं। 

यदि कोई ग्रह अस्त हो और वह पाप प्रभाव में भी हो तो ऎसे ग्रह के दुष्परिणामों से बचने के लिए दान करना श्रेष्ठ उपाय होता है। 

किसी ग्रह के अस्त होने पर ऎसे ग्रह की दशा - अन्तर्दशा में अनावश्यक विलंब, किसी कार्य को करने से मना करना अथवा अन्य प्रकार के दु:खों का सामना करना प़डता है। 

यदि व्यक्ति की कुण्डली में कोई ग्रह सूर्य के निकटतम होकर अस्त हो जाता है तो ऎसा ग्रह बलहीन हो जाता है।

उदाहरण के लिए विवाह का कारक ग्रह यदि अस्त हो जाए और नवांश लग्नेश भी अस्त हो तो ऎसा व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, सुंदर हो या कुरूप, ल़डका हो या ल़डकी निस्संदेह विवाह में विलंब कराता है। 

यदि इन ग्रहों की दशा या अन्तर्दशा आ जाए तो व्यक्ति जीवन के यौवनकाल के चरम पर विवाह में देरी कर देता है और वैवाहिक सुखों ( दांपत्य सुख ) से वंचित हो जाता है जिसके कारण उसे समय पर संतान सुख भी नहीं मिल पाता और वैवाहिक जीवन नष्ट सा हो जाता है। 

अब हम ग्रहों के अस्त होने पर उनके सामान्य फलों पर विचार करते हैं कि किसी ग्रह विशेष के अस्त हो जाने पर उनकी अंतर्दशा में कैसे परिणाम आते हैं।

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चंद्रमा :

किसी व्यक्ति की कुण्डली में चंद्रमा के अस्त होने पर मानसिक अशांति, माँ का अस्वस्थ होना, पैतृक संपत्ति का नष्ट होना, जन सहयोग का अभाव, व्यक्ति का अशांत हो जाना, दौरे आना, मिर्गी होना, फेफ़डों में रोग होना आदि घटनाएं होती है। 

यदि अस्त चंद्रमा अष्टमेश के पाप प्रभाव में हों तो व्यक्ति दीर्घकाल तक अवसादग्रस्त रहता है, इसी प्रकार द्वादशेश के प्रभाव में आने पर व्यक्ति नशे का आदि हो जाता है अथवा किसी बीमारी की निरंतर दवा खाता है।

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मंगल :

किसी व्यक्ति की कुण्डली में मंगल के अस्त होने पर उसकी अंतर्दशा में व्यक्ति क्रोधी, नसों में दर्द, रक्त का दूषित हो जाना, उच्चा अवसादग्रस्तता आदि कष्ट हो जाते हैं। 

यदि अस्त मंगल पर राहु/केतु का प्रभाव हो तो व्यक्ति दुर्घटना, मुकदमेंबाजी या कैंसर का शिकार हो जाता है। 

यदि मंगल षष्ठेश के पाप प्रभाव में हो तो अस्वस्थ्य, दूषित रक्त, कैंसर या विवाद में चोटग्रस्त हो जाता है। 

इसी प्रकार अष्टमेश के पाप प्रभाव में होने पर व्यक्ति घोटालेबाज हो जाता है, भष्टाचार में लिप्त रहता है। 

द्वादशेश के पाप प्रभाव में होने पर व्यक्ति किसी नशीले पदार्थ का सेवन करने लगता है।

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बुध :

अस्त बुध की अंतर्दशा में व्यक्ति भ्रमित, संवेदनशील, निर्णय लेने में विलंब करता है। 

अति विश्वास या न्यून विश्वास का शिकार होकर तनावग्रस्त हो जाता है, अशांत रहता है। 

उसके शरीर में लकवा, ऎंठन, श्वास रोग अथवा चर्म रोग हो जाते हैं। 

यदि अस्त बुध षष्ठेश के पाप प्रभाव में हो तो व्यक्ति तनाव, चर्म रोग या लकवाग्रस्त होकर अस्वस्थ रहता है। 

यदि बुध अष्टमेश के पाप प्रभाव में हो तो व्यक्ति दमा रोग से ग्रसित, मानसिक अवसाद अथवा किसी प्रियजन की मृत्यु का शोक भोगता है। 

यदि बुध द्वादशेश के पाप प्रभाव में हों तो व्यक्ति किसी नशे का शिकार या रोगग्रस्त रहता है।

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बृहस्पति : 

यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में बृहस्पति अस्त हों और बृहस्पति की अंतर्दशा आ जाए तो व्यक्ति लीवर की बीमारी और ज्वर से ग्रसित रहता है। 

वह अध्ययन से कट जाता है। 

उसकी आध्यात्मिक रूचि क्षीण हो जाती है, वह स्वार्थी हो जाता है। 

यदि अस्त बृहस्पति पर अन्य दूषित प्रभाव हों तो वह पुरूष संतान से वंचित हो सकता है। 

बृहस्पति के षष्ठेश के पाप प्रभाव में होने पर उच्चा ज्वर, टायफाइड, मधुमेह तथा मुकदमों में फँसना, अष्टमेश के पाप प्रभाव में होने पर प्रतिष्ठा में हानि, किसी प्रियजन का वियोग अथवा किसी बुजुर्ग की मृत्यु हो जाना, इसी प्रकार द्वादशेश के पाप प्रभाव में होने पर व्यक्ति के विवाहेत्तर संबंध बन जाते हैं और वह किसी व्यसन से ग्रसित हो जाता है।

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शुक्र :

जब किसी कुण्डली में शुक्र अस्त हो और उसकी अंतर्दशा आ जाए तो व्यक्ति की पत्नी रोगग्रस्त हो जाती है अथवा उसके गर्भाशय या बच्चोदानी में समस्या हो जाती है। 

व्यक्ति नेत्र रोग, चर्म रोग से भी ग्रसित हो जाता है। 

अस्त शुक्र के राहु - केतु के प्रभाव में आने पर व्यक्ति की प्रतिष्ठा नष्ट होती है, वह किडनी विकार या मधुमेह का शिकार हो जाता है। 

यदि अस्त शुक्र षष्ठेश के दुष्प्रभाव में हों तो मूत्राशय रोग, यौनांगों में विकार अथवा चर्म रोग से ग्रसित होता है, अष्टमेश के दुष्प्रभाव में होने पर दांपत्य जीवन में कटुता, किसी प्रियजन की मृत्यु का दु:ख तथा द्वादशेश के दुष्प्रभाव में होने पर व्यक्ति यौन संक्रमण रोग और नशे का आदि हो जाता है।

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शनि :

यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में शनि अस्त हो और उनकी दशा - अन्तर्दशा आ जावे तो वह अस्थि भंग होने, टांगों या पैरों में दर्द, रीढ़ की हड्डी में दर्द आदि से पीडित रहता है। 

उसे कठोर परिश्रम करना प़डता है, उसका कार्य व्यवहार नीच प्रकृति के लोगों से रहता है। 

उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त होने लगती है। 

शनि के राहु - केतु से प्रभावित होने पर जो़डो में दर्द रहने लगता है। 

अस्त शनि के षष्ठेश के पाप प्रभाव में होने पर रीढ़ की हड्डी में दर्द, जो़डों में दर्द, शरीर में जक़डन रहने लगता है, मुकदमों का सामना करना प़डता है। 

अस्त शनि के अष्टमेश के पाप प्रभाव में होने पर अस्थि टूट जाने, रोजगार में समस्या अथवा किसी प्रियजन का अभाव हो जाना होता है। 

शनि के द्वादशेश के पाप प्रभाव में होने पर व्यक्ति किसी बीमारी से ग्रस्त रहने लगता है अथवा व्यसन में डूब जाता है।

पंडारामा प्रभु राज्यगुरू

हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 

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🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -

श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,

" Shri Aalbai Niwas "

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JAM KHAMBHALIYA - 361305 (GUJRAT )

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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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