सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
राजयोग देते हैं सर्वसुख और जीवन के प्रशिक्षक हैं ये तीनों :
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्र, खगोलशास्त्र, ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा जन्मकुंडली–प्रश्नकुंडली के अनुसार राजयोग, सर्वसुख और जीवन का मार्गदर्शनजन्मपत्री में बलवान ग्रह और मजबूत भाव बनाते हैं राजयोग और देते हैं सर्वसुख...!
भारतीय सनातन परंपरा में वेद, ज्योतिष और खगोलशास्त्र को केवल भविष्य जानने का साधन नहीं माना गया, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण जीवन का मार्गदर्शक माना गया है।
श्री ऋग्वेद, श्री यजुर्वेद, वैदिक ज्योतिषशास्त्र, खगोलशास्त्र, जन्मकुंडली तथा प्रश्नकुंडली—
ये सभी मिलकर मनुष्य को उसके कर्म, भाग्य, समय और जीवन के उद्देश्य का ज्ञान कराते हैं। जब इनका सम्यक अध्ययन और सही मार्गदर्शन प्राप्त होता है, तब व्यक्ति अपने जीवन में उचित निर्णय लेकर सुख, समृद्धि और सफलता की ओर बढ़ सकता है।
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श्री वैदिक ज्योतिष शास्त्र अनुसार किसी की भी जन्मपत्री में ग्रह बलवान हों और भाग्य आदि भाव मजबूत हो, तो व्यक्ति को जीवन का सब सुख स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।
राजयोग का वास्तविक अर्थ :
अनेक लोग राजयोग का अर्थ केवल राजा जैसा धन, वैभव और प्रसिद्धि समझते हैं, परंतु वैदिक ज्योतिष के अनुसार राजयोग का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है।
राजयोग का अर्थ है—
जीवन में सम्मान, प्रतिष्ठा, नेतृत्व क्षमता, उत्तम निर्णय शक्ति, समाज में आदर, मानसिक संतुलन तथा धर्म के मार्ग पर चलकर सफलता प्राप्त करना।
श्री वैदिक ज्योतिष शास्त्र में ग्रह और भाव की स्थिति का आकलन करने के लिए अनेक नियम हैं !
जिनको ध्यान में रखकर यह पता लगाया जाता है कि जीवन में सुख और दुःख का क्या अनुपात है।
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हम सभी जानते हैं, जन्मपत्री में बारह घर होते हैं, जिनको भाव भी कहा जाता है, इन्हीं बारह भाव में जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन की समस्त घटनाऐं छिपी हुई होती हैं !
हर राजयोग करोड़पति बनने का संकेत नहीं देता।
किसी व्यक्ति के लिए राजयोग का फल उच्च पद, किसी के लिए विद्या, किसी के लिए आध्यात्मिक उन्नति, किसी के लिए सफल व्यापार, तो किसी के लिए परिवार का सुख भी हो सकता है।
इस लिए राजयोग का फल व्यक्ति की जन्मकुंडली, दशा, गोचर और कर्म के अनुसार अलग - अलग होता है।
जिन्हें ज्योतिषी ग्रहों की चाल एवं ज्योतिष के अनेक नियमों एवं सिद्धान्तों द्वारा फलादेश के रूप में उजागर करते हैं।
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एक मजबूत ग्रह और भाव दे सकते हैं अच्छे परिणाम-
श्री वैदिक ज्योतिष शास्त्र में कुछ बुनियादी नियम हैं, जिनसे किसी भी ग्रह की ताकत या मजबूती के बारे में निश्चित रूप से जाना जा सकता है।
ऋग्वेद का संदेश :
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किसी भाव की मजबूती देखने के लिए इस प्रकार विचार करना चाहिए।
कोई भी ग्रह तभी मजबूत होता है, जब वह निम्न शर्ते पूरी करता है।
किसी भी भाव का स्वामी, केन्द्र या त्रिकोण में स्थित हो अथवा केन्द्र एवं त्रिकोण का स्वामी उसी भाव में स्थित हो।
यदि कोई ग्रह केन्द्र भावों में या त्रिकोण भावों में स्थित हो अथवा शुभ ग्रहों के बीच में स्थित हो तो ऐसी अवस्था के कारण उस भाव अथवा ग्रह से संबंधित शुभ फल जातक को प्राप्त होते हैं।
ऋग्वेद का संदेश है कि जो व्यक्ति अपने कर्म को धर्मपूर्वक करता है, उसका भाग्य भी उसका साथ देता है।
इसी प्रकार ग्रह अपनी उच्च राशि, मूल त्रिकोण या मित्र राशि में स्थित हो।
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भाव और उसका स्वामी शुभ ग्रहों के मध्य में स्थित हो।
भाव और उसके स्वामी को शुभ ग्रह की दृष्टि मिलती हो।
लग्न का स्वामी लग्नेश मजबूत हो, दसवें भाव के स्वामी या अन्य शुभ ग्रहों के साथ युति हो।
यजुर्वेद का महत्व :
यजुर्वेद मुख्य रूप से यज्ञ, अनुशासन, कर्तव्य और जीवन की शुद्धता का वेद है।
इस में बताया गया है कि मनुष्य को अपने प्रत्येक कार्य में ईश्वर का स्मरण, सेवा, दान और सदाचार रखना चाहिए।
यदि कोई ग्रह अपने स्वयं के घर में स्थित हो या उस पर पूर्ण दृष्टि रखता हो।
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ग्रह या तो शुभ ग्रह के साथ किसी भाव में स्थित हो या उसे उसकी शुभ दृष्टि प्राप्त हो रही है।
यदि कोई ग्रह नवमांश कुंडली में वर्गोत्तम स्थिति में हो, तो ऐसी स्थिति में उस ग्रह एवं भाव से संबंधित शुभ फल व्यक्ति को उस ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर्दशा, गोचर आदि के कार्यकाल में मिलती है।
यजुर्वेद यह भी संकेत देता है कि जीवन में सकारात्मक ऊर्जा तभी आती है जब मन, वचन और कर्म शुद्ध हों।
यदि व्यक्ति केवल भाग्य पर निर्भर रहे और कर्म न करे, तो श्रेष्ठ योग भी पूर्ण फल नहीं दे पाते।
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खगोलशास्त्र और ज्योतिष का संबंध :
खगोलशास्त्र ग्रहों, नक्षत्रों और आकाशीय पिंडों की वास्तविक गति का विज्ञान है, जबकि वैदिक ज्योतिष उन्हीं ग्रह - स्थितियों का मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करता है।
इसी को समझकर ज्योतिर्विद फलादेश करते हैं।
जीवन के प्रशिक्षक हैं ये तीनों :
शनि की मेहनत, राहु की चतुराई और केतु का वैराग्य, जीवन के प्रशिक्षक हैं ये तीनों !
ज्योतिष शास्त्र में जिन नौ ग्रहों का वर्णन किया गया है, उनमें छाया ग्रह राहु - केतु का भी
विशेष महत्व है।
प्राचीन ऋषियों ने हजारों वर्षों के निरीक्षण से पाया कि ग्रहों की गति और समय के परिवर्तन का प्रभाव पृथ्वी पर होने वाली अनेक घटनाओं तथा मानव जीवन पर दिखाई देता है।
इसी आधार पर पंचांग, मुहूर्त, ग्रहण, नक्षत्र तथा ग्रहों की गणना विकसित हुई।
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जहां शनि देव व्यक्ति को परिश्रम कराते हैं, राहु चतुराई देता है, वहीं केतु वैराग्य और मोक्ष
दिलाता है।
इस प्रकार खगोलशास्त्र आधार है और ज्योतिष उसका फलित स्वरूप माना जाता है।
शनि, राहु और केतु को आमतौर पर दुख और कष्ट का कारक माना जाता है, लेकिन यदि
ये जन्मकुंडली में मजबूत हों तो राजयोग के समान फल देते हैं।
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+++- शनि कराता है मेहनत
- राहु देता है चतुराई
- केतु वैराग्य की ओर ले जाकर दिलाता है मोक्ष
जन्मकुंडली का महत्व :
आमतौर पर शनि, राहु, केतु इन तीनों को दुःख एवं कष्ट का कारक समझा जाता है, जब कि
ये तीनों जन्मकुंडली में बलवान हों, तो राजयोग के समान फल देते हैं।
जिस प्रकार राहु और शनि के बीच ज्यादा समानताएं होती हैं, उसी प्रकार केतु और मंगल के
बीच में भी एक विशिष्ट संबंध ज्योतिर्विदों ने माना है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सभी ग्रह कर्मों के आधार पर ही फल देते हैं।
नवग्रहों में शनिदेव को दंडनायक का पद प्राप्त है, जो व्यक्ति को उसके पूर्व जन्म के कर्मों के
अनुसार पुरस्कार - दण्ड दोनों देते हैं।
छाया ग्रह राहु - केतु का फल भी पूर्वजन्म के अनुसार व्यक्ति को मिलता है।
राहु व्यक्ति के पूर्व जन्म के गुणों एवं विशेषताओं के आधार पर शुभाशुभ फल देता है।
आमतौर पर एक आदमी सोचता है कि शनि, राहु, केतु ये तीनों दुःख, कष्ट, रोग एवं आर्थिक परेशानी देने वाले होते हैं पर ऐसा सबकी जन्मकुंडली में नहीं होता।
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यदि जन्मकुंडली में ये तीनों शुभ स्थिति में हैं तो जातक को लाभ में कमी नहीं होती।
ये तीनों व्यक्ति को बौद्धिक एवं तकनीकी तौर पर कुशल बना सकते हैं, जिससे इन्हें जीवन में सफलताएं मिलती हैं।
जहां शनि एक पिंड के रूप में मौजूद है, वहीं राहु - केतु छाया ग्रह हैं।
राहु - केतु की अपनी कोई राशि भी नहीं है इस लिए ये जिस राशि पर बैठते हैं उस पर अपना अधिकार कर लेते हैं।
प्रश्नकुंडली का महत्व :
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहु वृष राशि में उच्च का होता है और वृश्चिक राशि में नीच का।
राहु - केतु के बारे में ज्योतिषियों में मतांतर है, कुछ ज्योतिषी राहु को मिथुन राशि में उच्च और धनु राशि में नीच का मानते हैं, केतु को धनु में उच्च का मिथुन में नीच का मानते हैं।
ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि चूंकि शनि देव की गति धीमी है, इसलिए इसका शुभाशुभ फल जातक को धीरे - धीरे मिलता है।
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राहु - केतु अचानक फल देते हैं, अगर राहु एक पल में जातक को ऊंचाइयों पर पहुंचा सकता है तो अगले ही पल उसे कंगाल बनाने की क्षमता भी रखता है।
जबकि शनि देव जातक को परिश्रम एवं लगन तथा ईमानदारी से आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
शनि उन्हीं जातकों का साथ देते हैं, जो जीवन में सच बोलते हैं, पर राहु चतुराई और आसान तरीकों से सफलता पाने का विचार उत्पन्न कराता है।
सर्वसुख का वास्तविक अर्थ :
मार्गी शनि हो चुके हैं इन राशियों पर बना रहेगा शनिदेव का आशीर्वाद :
जीवन के प्रशिक्षक :
राजयोग के साथ आवश्यक गुण :
2026 के पहले ही दिन चतुर्ग्रही योग, इन 3 राशियों के लिए सचमुच हैप्पी होगा न्यू ईयर :
निष्कर्ष :
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,
" Shri Aalbai Niwas "
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏




