सभी ज्योतिष मित्रो को मेरा निवेदन है..., आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे..., मे किसी के लेखो की कोपी नहि करता..., किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही है..., कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्ता भाई..., और आगे भी नही बढ़ता..., आप आपके महेनत से त्यार होने से बहुत आगे बठा जाता है...,
धन्यवाद......, जय द्वारकाधीश...,
मूल नक्षत्र के अंतर्गत आश्लेषा नक्षत्र :
मूल नक्षत्र के अंतर्गत आश्लेषा नक्षत्र :
मूल नक्षत्र के अंतर्गत आश्लेषा नक्षत्र के अंतर्गत चार चरणों में शिशु का जन्म होता है तो वह सुलभ क्या फलदाई होता है...!
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या, श्री खगोलशास्त्रविद्या, श्री ऋग्वेद, श्री यजुर्वेद एवं श्री भविष्य पुराण अनुसार जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली एवं गोचर से आश्लेषा नक्षत्र का फलादेश, महत्व, नियम एवं उपाय
लेकिन जब आप इस ब्लॉग पोस्ट को पूरी तरह से पढ़ोगे तो सारी बातें समझ में आएंगी कि क्या शुभ है या अशुभ है...!
कैसे हम जानकारी प्राप्त करें उसके लिए आप ही लोगों के पृथक प्रकार से विवेचन करने के लिए हम उपस्थित हुए हैं...!
तो आइए विश्लेषण को आरंभ करते हैं मित्रों ध्यान देने की बात है...!
कि शोल्डर संस्कार के अंतर्गत हमारे सनातन धर्म में हर गर्म के अपने एक रूप होते हैं और मूल के प्रथम चरण में जन्म लिए जाने वाले जो सिद्ध होते हैं...!
उनके लिए जो मृत्युसूचक होता है जो जन्म का नक्षत्र होता है...!
मूल का प्रथम चरण होता है वह पिता के लिए वसुंधरा होता है...!
मूल नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म होने से यह मात्र के लिए अशुभ कारक है...!
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वैदिक ज्योतिष में 27 नक्षत्रों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
प्रत्येक नक्षत्र का अपना स्वभाव, देवता, ग्रह स्वामी, शक्ति तथा कर्मफल माना गया है।
इन्हीं 27 नक्षत्रों में आश्लेषा नक्षत्र नवां नक्षत्र है।
इस का स्वामी बुध ग्रह तथा अधिदेवता नाग ( सर्प ) माने जाते हैं।
यह नक्षत्र कर्क राशि के अंतिम चरण में स्थित होकर मन, बुद्धि, रहस्य, आध्यात्मिक चिंतन, शोध, चिकित्सा, गूढ़ ज्ञान तथा सूक्ष्म निरीक्षण की प्रवृत्ति का प्रतीक माना जाता है।
यानि कि मंत्री के स्वास्थ्य में प्रभाव डालेगा दुष्प्रभाव डालेगा मूल नक्षत्र के तृतीय चरण में उत्पन्न जो शिशु है...!
आर्थिक क्षति का सूचक यह है मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लिया है...!
तो यह सुख कारक है अर्थात मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शिशु जब जन्म लेता है...!
वह सुख का कारक होता है वह सुख समृद्धि का सूचक होता है मूल नक्षत्र के प्रथम चरण से चतुर्थ चरणों तक का फल अश्लेषा नक्षत्र यह है...!
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आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण से प्रथम चरण तक के लिए मूल नक्षत्र के विलोम अर्थात विपरीत समझना की जिए...!
ऋग्वेद, यजुर्वेद, पुराणों तथा वैदिक ज्योतिष की परंपरा में नक्षत्रों को ईश्वर की दिव्य व्यवस्था का अंग माना गया है।
जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली तथा गोचर में आश्लेषा नक्षत्र की स्थिति व्यक्ति के स्वभाव, निर्णय क्षमता तथा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के विश्लेषण में सहायक मानी जाती है।
जैसे आश्लेषा के चतुर्थ चरण में जन्म लिया है तो शिशु पितृ के लिए हानिकारक है..!
तृतीय चरण में जन्म लेने से मात्र के लिए हानिकारक है और द्वितीय चरण में धन हानि की संभावना होती है यह संकेत प्राप्त हो हैं...!
और लाख लेता नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने वाले शिशु जो होते हैं...!
वह पुत्र जो पुत्र कन्या उत्पन्न होते हैं तो ऐसे समय में उत्पन्न जातक धम्म सुख समृद्धि कारक होते हैं...!
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आश्लेषा नक्षत्र का आध्यात्मिक महत्व :
आश्लेषा का संबंध नाग शक्ति से माना जाता है।
नाग केवल सर्प का प्रतीक नहीं, बल्कि जागृत चेतना, संरक्षण, रहस्य, कुंडलिनी शक्ति और आत्मसंयम का भी प्रतीक हैं।
यह नक्षत्र व्यक्ति को भीतर छिपी हुई शक्तियों को पहचानने तथा विवेकपूर्वक उनका उपयोग करने की प्रेरणा देता है।
यहां पर ध्यान देने की अनिष्ट फलों की शांति के लिए शास्त्रों में शिशु के त्यागने से लेकर के अश्वगंधा नक्षत्रों की जो शांति प्रयोग करने पर मूल और आख्या में उत्पन्न दुश्मन से माता - पिता आदि के अनिष्ट फलों का संपूर्ण निराकरण हो जाता है...!
ऐसा भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथ में मुद्रित है प्रिय मित्रों इस ब्लॉग पोस्ट के अंतर्गत हम आप लोगों को यह समझाने व्यक्ति यह है...!
कि जो गंडमूल होता है मूल नक्षत्र के एवं आश्लेषा नक्षत्र के जो चार चरण होते हैं...!
यह दोनों क्षेत्रों के बारे में चर्चा की गई मूल नक्षत्र के चार चरण और चार चरण आश्लेषा नक्षत्र का तो मुल्क के किन - किन नक्षत्रों में जातक का जन्म होता है...!
तो यह किसके लिए हानिकारक है इस के लिए शुक्र है आप नेताओं ने क्षेत्र में जिसका हानि करता है...!
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जन्मकुंडली में आश्लेषा नक्षत्र :
यदि जन्म के समय चंद्रमा आश्लेषा नक्षत्र में हो, तो जातक सामान्यतः बुद्धिमान, सूक्ष्म विचारक, गुप्त विषयों में रुचि रखने वाला, परिस्थितियों को गहराई से समझने वाला तथा रणनीतिक सोच रखने वाला हो सकता है।
कुंडली के अन्य ग्रहों, भावों और योगों के अनुसार इसके फल में परिवर्तन होता है।
किसी भी निष्कर्ष के लिए संपूर्ण जन्मकुंडली का अध्ययन आवश्यक है।
आज हम आप लोगों को यह बतलाएंगे की मूल नक्षत्र के अंतर्गत आश्लेषा नक्षत्र के अंतर्गत चार चरणों में शिशु का जन्म होता है तो वह सुलभ क्या फलदाई होता है...!
उसके लिए आप ही लोगों के पृथक प्रकार से विवेचन करने के लिए हम उपस्थित हुए हैं...!
तो आइए विश्लेषण को आरंभ करते हैं मित्रों ध्यान देने की बात है कि शोल्डर संस्कार के अंतर्गत हमारे सनातन धर्म में हर गर्म के अपने एक रूप होते हैं....!
और मूल के प्रथम चरण में जन्म लिए जाने वाले जो सिद्ध होते हैं...!
उनके लिए जो मृत्युसूचक होता है जो जन्म का नक्षत्र होता है...!
मूल का प्रथम चरण होता है वह पिता के लिए वसुंधरा होता है...!
मूल नक्षत्र के दूसरे चरण में जन्म होने से यह मात्र के लिए अशुभ कारक है...!
यानि कि मंत्री के स्वास्थ्य में प्रभाव डालेगा दुष्प्रभाव डालेगा मूल नक्षत्र के तृतीय चरण में उत्पन्न जो शिशु है...!
आर्थिक क्षति का सूचक यह है मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लिया है...!
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प्रश्नकुंडली में आश्लेषा :
यदि प्रश्नकुंडली में चंद्रमा या प्रमुख संकेतक ग्रह आश्लेषा नक्षत्र से संबंधित हों, तो यह संकेत दे सकता है कि विषय में गहराई, गोपनीयता, धैर्य तथा सूक्ष्म जांच की आवश्यकता है।
अंतिम फलादेश प्रश्नकुंडली के संपूर्ण ग्रहयोगों पर निर्भर करता है।
तो यह सुख कारक है अर्थात मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में शिशु जब जन्म लेता है वह सुख का कारक होता है वह सुख समृद्धि का सूचक होता है...!
मूल नक्षत्र के प्रथम चरण से चतुर्थ चरणों तक का फल अश्लेषा नक्षत्र यह है...!
आश्लेषा नक्षत्र के चतुर्थ चरण से प्रथम चरण तक के लिए मूल नक्षत्र के विलोम अर्थात विपरीत समझना कीजिए...!
जैसे आश्लेषा के चतुर्थ चरण में जन्म लिया है तो शिशु पितृ के लिए हानिकारक है तृतीय चरण में जन्म लेने से मात्र के लिए हानिकारक है...!
और द्वितीय चरण में धन हानि की संभावना होती है यह संकेत प्राप्त हो हैं...!
और लाख लेता नक्षत्र के प्रथम चरण में जन्म लेने वाले शिशु जो होते हैं....!
वह पुत्र जो पुत्र कन्या उत्पन्न होते हैं तो ऐसे समय में उत्पन्न जातक धम्म सुख समृद्धि कारक होते हैं...!
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गोचर में आश्लेषा नक्षत्र :
जब चंद्रमा या अन्य ग्रह गोचर में आश्लेषा नक्षत्र से गुजरते हैं, तब आत्मविश्लेषण, योजनाओं की समीक्षा, मानसिक एकाग्रता तथा आध्यात्मिक अभ्यास के लिए समय शुभ माना जाता है।
बड़े निर्णय लेते समय संपूर्ण गोचर, दशा और व्यक्तिगत कुंडली का भी विचार करना चाहिए।
यहां पर ध्यान देने की अनिष्ट फलों की शांति के लिए शास्त्रों में शिशु के त्यागने से लेकर के अश्वगंधा नक्षत्रों की जो शांति प्रयोग करने पर मूल और आख्या में उत्पन्न दुश्मन से माता - पिता आदि के अनिष्ट फलों का संपूर्ण निराकरण हो जाता है...! ऐसा भारतीय ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथ में मुद्रित है प्रिय मित्रों इस ब्लॉग पोस्ट के अंतर्गत हम आप लोगों को यह समझाने व्यक्ति यह है...!
कि जो गंडमूल होता है मूल नक्षत्र के एवं आश्लेषा नक्षत्र के जो चार चरण होते हैं यह दोनों क्षेत्रों के बारे में चर्चा की गई मूल नक्षत्र के चार चरण और चार चरण आश्लेषा नक्षत्र का तो मुल्क के किन - किन नक्षत्रों में जातक का जन्म होता है...!
तो यह किसके लिए हानिकारक है इसके लिए शुक्र है आप नेताओं ने क्षेत्र में जिसका हानि करता है...!
इस के लिए शुभ कारक होता है यह अत्यंत हम बहुत ही सरल रूप से आप लोगों के सामने विंटर देखिए आशा करता हूं....!
कि यह ब्लॉग पोस्ट आप लोगों को पसंद आएगा और आप लोग उपयोगी बनाएंगे...!
आश्लेषा नक्षत्र के शुभ गुण :
- तीव्र बुद्धि और विश्लेषण क्षमता।
- गूढ़ विषयों, ज्योतिष, आयुर्वेद, शोध एवं आध्यात्मिक अध्ययन में रुचि।
- परिस्थितियों को गहराई से समझने की क्षमता।
- धैर्य, संयम और रणनीतिक सोच।
- कठिन परिस्थितियों में समाधान खोजने की योग्यता।
सावधानियां :
यदि बुध या चंद्रमा पीड़ित हों अथवा अन्य अशुभ ग्रहयोग हों, तो मानसिक तनाव, भ्रम, अधिक संदेह या भावनात्मक अस्थिरता जैसी चुनौतियाँ अनुभव हो सकती हैं।
ऐसे में योग्य ज्योतिषीय परामर्श तथा आध्यात्मिक अनुशासन लाभकारी माना जाता है।
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नियम:
- सत्य, संयम और सदाचार का पालन करें।
- माता-पिता एवं गुरु का सम्मान करें।
- क्रोध, छल और कटु वाणी से बचें।
- प्रतिदिन ईश्वर का स्मरण करें।
- सात्त्विक भोजन एवं शुद्ध आचरण अपनाएँ।
- नाग एवं समस्त जीवों के प्रति करुणा रखें।
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उपाय :
शास्त्रीय परंपराओं में निम्न उपाय श्रद्धा के साथ किए जाते हैं—
- बुधवार को भगवान गणेश एवं बुध ग्रह की उपासना करें।
- भगवान शिव का जलाभिषेक करें और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करें।
- "ॐ बुं बुधाय नमः" मंत्र का जप श्रद्धापूर्वक करें।
- नाग पंचमी के अवसर पर भगवान शिव एवं नागदेवता का पूजन करें।
- हरे वस्त्र, हरी मूंग अथवा आवश्यकता अनुसार दान करें।
- विद्या, सेवा और सदाचार को जीवन में स्थान दें।
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संभावित फल :
जब जन्मकुंडली, दशा, गोचर और कर्म अनुकूल हों, तब आश्लेषा नक्षत्र से जुड़े जातकों को विद्या, शोध, लेखन, ज्योतिष, चिकित्सा, परामर्श, प्रशासन, व्यापार और आध्यात्मिक साधना के क्षेत्रों में उन्नति प्राप्त हो सकती है।
प्रतिकूल ग्रहयोग होने पर धैर्य, साधना, उचित परामर्श और सत्कर्मों का मार्ग अपनाना हितकारी माना गया है।
आश्लेषा नक्षत्र रहस्य, ज्ञान, विवेक, आत्मसंयम और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी भी नक्षत्र को शुभ या अशुभ मानने के स्थान पर संपूर्ण जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली, ग्रहदशा तथा गोचर का समन्वित अध्ययन करना आवश्यक है।
श्रद्धा, सत्कर्म, ईश्वर भक्ति, गुरु मार्गदर्शन और उचित ज्योतिषीय विश्लेषण के माध्यम से जीवन की दिशा अधिक स्पष्ट और संतुलित बनाई जा सकती है। हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!!
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