पूर्व जन्म और ज्योतिष
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सनातन विश्व हिंदू धार्मिक अनुसार चार वेदों अठार पुराण अनुसार हिंदी गुजराती भाषा का ब्लॉग पोस्ट
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🌞 ब्रह्मचर्य और ज्योतिष का संबंध ऋषि बोले— “ज्योतिष मनुष्य के कर्म और स्वभाव के संकेतों का अध्ययन करता है। ग्रह किसी व्यक्ति को जबरदस्ती पाप या पुण्य करने के लिए मजबूर नहीं करते। जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति व्यक्ति की प्रवृत्ति, मानसिक प्रकृति, इच्छाशक्ति, आकर्षण, संयम और जीवन की परिस्थितियों के संकेत दे सकती है।” “इस लिए किसी व्यक्ति की ब्रह्मचर्य - शक्ति का निर्णय केवल एक ग्रह या एक भाव देखकर नहीं करना चाहिए।”
उन्होंने कहा— “विशेष रूप से लग्न, पंचम भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव, द्वादश भाव, चंद्रमा, शुक्र, मंगल, गुरु और शनि की स्थिति तथा उनके परस्पर संबंधों को व्यापक रूप से देखना चाहिए।” सामने वालो को झुकाव में लाने की पूर्ण टक्कर देने की ताकत भी रख शकता है।
गीता में कहा गया है कि मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्मों से वर्तमान जीवन को पाता है और अलग - अलग क्षेत्रों से जुड़कर सफलता प्राप्त करता है। कुछ लोग आध्यात्मिक जगत से जुड़कर भी महान और प्रसिद्ध हो जाते हैं । रामकृष्ण परमहंस, श्री श्री रविशंकर भी ऐसे ही लोगों में से हैं।
दरअसल इन सब के पीछे उनकी जन्मपत्री में मौजूद ग्रहों की खास स्थिति होती है । जो ब्रह्मचार्य संन्यास योग बनाकर मनुष्य को आध्यात्मिक जगत में महान और सफल बना देता है ।
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| Item Form | Cream } |
अगर आपकी जन्मपत्री में भी ऐसे योग हैं । तो समझ लीजिए आप भी भौतिक जगत से अलग आध्यात्म की दुनिया में अपनी पहचान बनाने में सफल होंगे । चन्द्रमा यदि शनि या मंगल के द्रेष्काण में होकर मात्र शनि से दृष्ट हो तो भी जातक संन्यासी हो सकता है। यदि चन्द्रमा शनि या मंगल के नवांश में हो कर शनि से दृष्ट हो तब भी संन्यास योग बनता है। यह योग स्वामी रामकृष्ण परमहंस की कुंडली में बन रहा था।
स्वामी प्रभुपाद जी की कुंडली थी ऐसी ही है ।
सूर्य और गुरु की युति धार्मिक स्थानों में सेवा करने या पूजा स्थलों के निर्माण का एक अति महत्वपूर्ण ज्योतिषीय योग है।
यह योग मकर लग्न की स्वामी प्रभुपाद जी की कुंडली में था जिन्होंने पिछली सदी में अनेक राधा - कृष्ण मंदिरों का विश्वभर में निर्माण करवाया । धर्म त्रिकोण ले जाता है ब्रह्मचार्य आधात्मिक उन्नति की ओर कुंडली में धर्म त्रिकोण ( लग्न , पंचम और नवम ) तथा मोक्ष त्रिकोण ( चतुर्थ , अष्टम और द्वादश ) की स्वामियों का सम्बन्ध जातक को जीवन में आधात्मिक उन्नति की ओर ले कर जाता है। यह योग जन्म लग्न और चंद्र लग्न दोनों से देखा जाना चाहिए। शरीर मे सार वस्तु ही वीर्य ही है । इस के नास से आज हमारा देश रसतलको पहुच गया है ब्रह्मचार्य नाश के ही कारण आज भी हम लोग छोटी - छोटी बीमारियों का शिकार बन गए है । जीवन की थोडीक ही अवस्था काल के गले मे जा रहे है । इस के कारण आज हमलोग अपने बल, तेज , वीरता ओर आत्मसन्मान को खो कर पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ चुके है । ओर जो हमारा देश किसिब्सम्य विश्व का सिरमौर ओर सभ्यताका उद्गमस्थान बना हुआ था । वही आज हम दुशरो के द्वारा लांछित ओर परदलित हो रहा है ।
आज हम विद्या - बुद्धि - बल - वीर्य , कला - कौशल - सब मे हम पिछड़े हुए है । इसी के कारण ही आज हम चरित्र में भी गिर गए है ।
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सारांश यह है कि ! किसी भी बात को लेकर आज हम संसार के सामने अपना मस्तक ऊंचा नही कर शकते । वीर्य का नाश ही हमारी इस गिरी हुई दशा का प्रधान मुख्य कारण ही मालूम होता है । आज के समय का चलचित्रों भी वीर्यरक्षाके के लिये बनाया ही नही जाता कैसे वीर्य का नाश हो सब लोग का बुद्धि नास हो । भाई - भाई के बीच, मा बेटियों के बीच , बहु सासुओं के बीच लड़ाई झगड़े होता रहे । किसी का भी स्त्री मा बहन बेटियों का ज्यादा अपमानित ओर आबरू से लांछित किया जाय । इस में कैसे प्रसकर्मी बने कैसे किसी का अपमानित किया जाय वही चलचित्रों आज के समय मे ज्यादा फैसन बन चुका है ।
मन और ब्रह्मचर्य ऋषि ने सबसे पहले चंद्रमा की ओर संकेत किया। “वत्स! मन पर नियंत्रण के बिना इंद्रियों पर नियंत्रण कठिन होता है।
इस लिए चंद्रमा का महत्व बहुत अधिक है।” चंद्रमा मन, भावना, कल्पना, संवेदनशीलता और मानसिक स्थिरता का ज्योतिषीय कारक माना जाता है। यदि चंद्रमा शुभ और बलवान हो तथा शुभ ग्रहों से संबंधित हो तो व्यक्ति में मानसिक संतुलन, विचारों पर नियंत्रण और परिस्थितियों को समझने की क्षमता बढ़ सकती है। यदि चंद्रमा अत्यधिक पीड़ित हो तो मन में चिंता, कल्पना की अधिकता, भावनात्मक अस्थिरता या विषयों के प्रति अत्यधिक आकर्षण जैसी प्रवृत्तियाँ दिखाई दे सकती हैं। ऋषि बोले— “लेकिन याद रखना, वत्स—
कुंडली मन की प्रवृत्ति बता सकती है, मनुष्य का अंतिम निर्णय नहीं।”
विचार, संस्कार और विवेक पंचम भाव को बुद्धि, विवेक, मंत्र, विद्या, संस्कार, संतान और पूर्व पुण्य से संबंधित माना जाता है। गुरु बोले— “ब्रह्मचर्य केवल शरीर का विषय नहीं है।
यदि विचार अशुद्ध हों तो बाहरी संयम अधूरा रह सकता है।
इस लिए पंचम भाव और उसके स्वामी का बल महत्वपूर्ण माना जाता है।” शुभ पंचम भाव व्यक्ति को अध्ययन, मंत्र, ध्यान, ज्ञान और रचनात्मक कार्यों की ओर ले जा सकता है। ऐसा व्यक्ति अपनी ऊर्जा को शिक्षा, साधना, ज्योतिष, कला, साहित्य, अनुसंधान या समाजसेवा में लगाने की क्षमता रख सकता है। यदि पंचम भाव पीड़ित हो तो मन में विचारों का संघर्ष या एकाग्रता की कमी हो सकती है। उपाय: गुरुजनों का सम्मान, मंत्र - जप, स्वाध्याय और नियमित ध्यान।
संबंध, विवाह और कामना शिष्य ने पूछा— “गुरुदेव! सप्तम भाव को विवाह का भाव कहा जाता है।
इस का ब्रह्मचर्य से क्या संबंध है?” ऋषि बोले— “सप्तम भाव संबंध, विवाह, साझेदारी और दांपत्य जीवन से जुड़ा माना जाता है।
इस लिए ब्रह्मचर्य को समझने में इसका अध्ययन आवश्यक है।
लेकिन सप्तम भाव में किसी ग्रह की स्थिति देखकर यह कहना उचित नहीं कि व्यक्ति निश्चित रूप से ब्रह्मचारी रहेगा या नहीं।” शुभ सप्तम भाव व्यक्ति को संबंधों में मर्यादा, जिम्मेदारी और संतुलन दे सकता है। यदि सप्तम भाव पर तीव्र अशुभ प्रभाव हों तो संबंधों में अस्थिरता, अत्यधिक आकर्षण या भावनात्मक संघर्ष जैसी स्थितियाँ बन सकती हैं। लेकिन ऋषि ने विशेष रूप से कहा— “ग्रह प्रवृत्ति दिखा सकते हैं; चरित्र का निर्माण मनुष्य के संस्कार, निर्णय और कर्म से होता है। ( आगे का लेख भाग 2 पर )
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