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Saturday, August 22, 2026

( जन्म पत्रिका में योनि )

( जन्म पत्रिका में योनि )

नक्षत्रों की योनि, गुण, स्वभाव, प्रभाव, महत्व, फल, नियम और उपाय!

भारतीय ज्योतिष परंपरा में आकाश को केवल ग्रहों की गति से नहीं, बल्कि नक्षत्रों की सूक्ष्म व्यवस्था से भी समझा गया है। 

वैदिक ज्योतिष में 27 प्रमुख नक्षत्रों का विशेष महत्व माना जाता है। 

प्रत्येक नक्षत्र का अपना स्वामी, देवता, प्रतीक, शक्ति, गुण, स्वभाव और परंपरागत योनि - वर्ग बताया गया है। 

जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होता है, उसे जन्म नक्षत्र कहा जाता है और उसी के आधार पर व्यक्ति की मानसिक प्रवृत्ति, व्यवहार, रुचि तथा जीवन के अनेक क्षेत्रों का ज्योतिषीय अध्ययन किया जाता है।


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श्री ऋग्वेद के अनुसार ( जन्म पत्रिका में योनि ) गुण एवं स्वभाव इस संसार में जीवन धारियों की कुल 84 लाख योनियां हैं। 

वैदिक ज्योतिषशास्त्र, नक्षत्रपद्धति, कृष्णमूर्ति पद्धति, अंकशास्त्र, हस्तरेखा, सामुद्रिकशास्त्र, वास्तु तथा वैदिक - पौराणिक परंपराओं को समन्वित दृष्टि से देखने पर नक्षत्र केवल जन्म का एक संकेत नहीं रहता, बल्कि व्यक्ति के सूक्ष्म स्वभाव को समझने का माध्यम बन जाता है।

मनुष्य योनि को इन सभी योनियों में कर्म प्रधान माना गया है। 

नक्षत्रों की योनि का विचार विशेष रूप से स्वभाव, आकर्षण, पारस्परिक सामंजस्य और वैवाहिक मिलान के संदर्भ में प्रसिद्ध है। 

लेकिन इसे केवल स्त्री-पुरुष संबंध तक सीमित करना उचित नहीं है। 

योनि-विचार को व्यापक अर्थ में किसी व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति, प्रतिक्रिया, पसंद-नापसंद और संबंधों में सामंजस्य समझने की एक पारंपरिक ज्योतिषीय पद्धति के रूप में देखा जा सकता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिस नक्षत्र में हमारा जन्म होता है उस नक्षत्र से संबंधित योनि के अनुसार हमारा स्वभाव, व्यवहार और व्यक्तित्व होता है।

यहां एक बात स्पष्ट रखना आवश्यक है कि नक्षत्र - योनि का विस्तृत वर्गीकरण मुख्यतः ज्योतिषीय परंपरा और अष्टकूट मिलान में विकसित हुआ है। 

प्रत्येक कथन को शाब्दिक रूप से ऋग्वेद, भविष्यपुराण या भृगु संहिता का प्रत्यक्ष मंत्र - वचन मानना उचित नहीं होगा। 

वैदिक मंत्रों का उपयोग यहां परंपरागत देवता - उपासना और आध्यात्मिक उपाय के संदर्भ में किया जा रहा है।

इस संसार में जितने भी जीव हैं वह किसी ना किसी योनि से अवश्य ही संबंध रखते हैं। 


योनि क्या है ?


नक्षत्रों को 14 योनि - वर्गों में विभाजित किया गया है। 

परंपरागत अष्टकूट गुण मिलान में योनि कूट को विशेष स्थान दिया जाता है। 

प्रत्येक नक्षत्र का एक प्रतीकात्मक पशु - योनि से संबंध माना गया है। 

एक ही योनि के नक्षत्रों में सामान्यतः अनुकूलता मानी जाती है, जबकि कुछ योनियों को परस्पर विरोधी माना गया है।


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यह ध्यान रखना आवश्यक है कि योनि कूट केवल विवाह का अंतिम निर्णय नहीं है। 

वैदिक विवाह मिलान में वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भकूट और नाड़ी आदि अनेक कूटों का विचार किया जाता है। 

इसके अतिरिक्त कुंडली के सातवें भाव, सप्तमेश, शुक्र, गुरु, चंद्रमा और दशा का भी अध्ययन आवश्यक माना जाता है।

वैदिक ज्योतिष में भी इन योनियों के महत्व पर बल दिया गया है और इनका संबंध नक्षत्रों से जोड़ा गया है।

योनियों के वर्गीकरण में अभिजीत सहित 28 नक्षत्रों को लिया गया है। 

नक्षत्र और योनि का रहस्य :

27 नक्षत्रों को परंपरागत रूप से 14 योनियों में बांटा गया है। 

योनि का अर्थ यहां प्रतीकात्मक प्रकृति और मूल स्वभाव से है। 

विवाह मिलान में इसे शारीरिक एवं मानसिक सामंजस्य के एक कूट के रूप में देखा जाता है, जबकि व्यापक अर्थ में यह व्यक्ति के व्यवहार और संबंधों की प्रवृत्ति समझने में सहायक माना जा सकता है।

तो इन 28 नक्षत्रों के हिसाब से ये योनियां चौदह हुईं ।


क्योंकि दो नक्षत्रों को एक योनि के अन्तर्गत रखा जाता है। 


तभी तो दो नक्षत्रों को मिलाकर देखा जाता है कि यह किस प्रकार की योनि बना रहे हैं और यह सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सही भी है या नहीं।


कुंडली मिलान में योनि मिलान क्यों ?


ऐसा कहा जाता है कि सफल वैवाहिक जीवन के लिए स्त्री और पुरुष दोनों के नक्षत्र की योनि समान होनी चाहिए। 


इस से दोनों के आंतरिक गुण समान होने से आपसी मतभेद होने की संभावना कम रहती है।


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यानि कि एक सफल वैवाहिक जीवन इसी योनि के कारण बनता है।

14 प्रकार की योनियो की जानकारी : -


पहली सात : -


अश्व योनि - अश्विनी, शतभिष; 

गज योनि - भरणी, रेवती; 

मेष योनि - पुष्य, कृतिका; 

सर्प योनि - रोहिणी, मृ्गशिरा; 

श्वान योनि - मूल, आर्द्रा; 

मार्जार योनि - आश्लेषा, पुनर्वसु; 

मूषक योनि - मघा, पूर्वाफाल्गुनी।


शेष सात : -


गौ योनि - उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद; 

महिष योनि - स्वाती, हस्त; 

व्याघ्र योनि - विशाखा, चित्रा; 

मृग योनि - ज्येष्ठा, अनुराधा; 

वानर योनि - पूर्वाषाढ़ा, श्रवण; 

नकुल योनि - उत्तराषाढ़ा, अभिजीत; 

सिंह योनि - पूर्वाभाद्रपद, धनिष्ठा।

+++ +++

14 योनि और 27 नक्षत्र :


दूसरा तरीके से देखा जाय  परंपरागत नक्षत्र - योनि वर्गीकरण इस प्रकार बताया जाता है—


अश्व योनि — अश्विनी और शतभिषा।

गज योनि — भरणी और रेवती।

मेष योनि — कृत्तिका और पुष्य।

सर्प योनि — रोहिणी और मृगशीर्ष।

श्वान योनि — आर्द्रा और मूल।

मार्जार योनि — पुनर्वसु और आश्लेषा।

मूषक योनि — मघा और पूर्वाफाल्गुनी।

सिंह योनि — उत्तराफाल्गुनी और धनिष्ठा।

महिष योनि — हस्त और स्वाती।

व्याघ्र योनि — चित्रा और विशाखा।

मृग योनि — अनुराधा और ज्येष्ठा।

वानर योनि — पूर्वाषाढ़ा और श्रवण।

नकुल योनि — उत्तराषाढ़ा।

गो योनि — उत्तराभाद्रपदा।


यह वर्गीकरण पारंपरिक ज्योतिषीय ग्रंथों में मिलने वाली नक्षत्र-योनि व्यवस्था पर आधारित है। 

विभिन्न परंपराओं में नाम या व्याख्या के छोटे अंतर मिल सकते हैं, इस लिए किसी विशिष्ट कुंडली के निर्णय में अपनाई गई परंपरा को स्पष्ट रखना उचित है। 

यहां योनि को केवल बाहरी पशु - स्वभाव के रूप में नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक मनोवृत्ति के रूप में समझना चाहिए।



योनियों का संबंध क्या फल प्रदान करता है : -


कुंडली शास्त्र के अनुसार योनियों का परस्पर संबंध पांच प्रकार से होता है। 

ये संबंध ही अपने मुताबिक वर-वधु के रिश्ते पर प्रभाव डालते हैं।


स्वभाव योनि : -


पहला है स्वभाव योनि, जिसका अर्थ है वर तथा कन्या की योनि एक है। 

यदि दोनों की योनि एक ही है तब विवाह को शुभ माना गया है।


मित्र योनि : -


वर-वधु की कुंडली को मिलाकर यदि मित्र योनि बने, तो ऐसा विवाह मधुर बनता है। 

ऐसे शादीशुदा जोड़े में आपसी समझ की अधिकता एवं प्यार काफी ज्यादा होता है।


उदासीन अथवा सम योनि : -


यदि लड़के तथा लड़की की कुण्डली में दोनों की योनियां परस्पर उदासीन स्वभाव की हैं तब वैवाहिक संबंध औसत ही रहते हैं। 

ऐसे विवाह में कोई ना कोई छोटी - मोटी परेशानी चलती ही रहती है जो रिश्ते पर सवाल खड़े कर देती है।


शत्रु योनि : -


यदि वर तथा कन्या की परस्पर योनियां मिलाने पर ये शत्रु स्वभाव की बनें, तो ऐसा विवाह नहीं करना चाहिए। 

यह विवाह कुंडली शास्त्र के अनुसार अशुभ माना जाता है, अंतत: इसे टालने में ही सबकी भलाई है।

+++ +++

महाशत्रु योनि : -


शत्रु योनि से भी बढ़कर महाशत्रु योनि है ।

यदि वर तथा कन्या कि योनियों में महाशत्रुता हो तो यह बेहद अशुभ विवाह बनता है। 

ना केवल इससे दाम्पत्य जीवन में वियोग तथा कष्टों का सामना करना पड़ सकता है ।

साथ ही वर - वधु से जुड़े दो परिवार भी इस विवाह के अशुभ संकटों में फंसते चले जाते हैं।

वर - वधु की कुंडली का मिलान करते समय ज्योतिषी कई तरह की गलतियां कर जाते हैं। 

कई बार तो वे उन अहम बिंदुओं को परखना ही भूल जाते हैं जो भविष्य में वर - वधु के शादीशुदा जीवन की नींव बनने वाले हैं। 

या फिर यदि परखते भी हैं तो उस गहराई से नहीं, जितनी कि आवश्यकता होती है। 

इन्हीं कभी भी नजरअंदाज ना करने वाली चीजों में से एक है कुंडली का “योनि मिलान”। 

वर एवं वधु किस योनि से हैं एवं उन दोनों की योनि एक - दूसरे के लिए अनुकूल है या नहीं । 

इस बात को जान लेना बेहद महत्वपूर्ण है।


योनियों के अनुसार जातको के स्वभाव : -


अश्व योनि का गुण और स्वभाव  : -


अश्व यानी घोड़ा गति, स्वेच्छाचारी, साहसी, प्रभावशाली, ओजस्वी, दमदार आवाज इत्यादि ,स्वतंत्रता, ऊर्जा और आगे बढ़ने की इच्छा का प्रतीक माना जाता है। 

अश्विनी और शतभिषा से संबंधित जातकों में स्वतंत्र विचार, तेजी से कार्य करने की प्रवृत्ति और अपने रास्ते पर आगे बढ़ने की इच्छा का ज्योतिषीय संकेत माना जाता है।


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ऐसे व्यक्ति स्थिरता से अधिक प्रगति और स्वतंत्रता को महत्व दे सकते हैं। 

यदि कुंडली में मंगल, सूर्य या बुध का सहयोग हो तो नेतृत्व, तकनीकी कार्य, यात्रा, चिकित्सा या स्वतंत्र व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में सक्रियता दिखाई दे सकती है। 

अश्विनी और शतभिषा की अश्व योनि गति, स्वतंत्रता, ऊर्जा और आगे बढ़ने की इच्छा का प्रतीक मानी जाती है। 

ऐसे जातक नए कार्य शुरू करने और परिस्थितियों को तेजी से समझने वाले हो सकते हैं।


अश्व से संबंधित वैदिक भावना में गति और शक्ति का विशेष महत्व दिखाई देता है। 

सूर्योपासना के समय प्रचलित मंत्र—


“ॐ सूर्याय नमः।”


का श्रद्धापूर्वक जप मन में अनुशासन और प्रकाश की भावना उत्पन्न करने वाला आध्यात्मिक अभ्यास माना जा सकता है।

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गज योनि का स्वभाव : -


गज यानी हाथी को शक्ति, गंभीरता, धैर्य, स्मरणशक्ति और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। 

भरणी और रेवती से संबंधित गज योनि व्यक्ति में सहनशीलता, जिम्मेदारी और परिस्थितियों को संभालने की क्षमता का संकेत दे सकती है।


ऐसे व्यक्ति सामान्यतः जल्दबाजी की अपेक्षा परिस्थिति को समझकर निर्णय लेने वाले माने जाते हैं।

संबंधों में विश्वास और स्थिरता उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।


गज योनि बलवान, शक्तिशाली, उत्साही एवं सम्मानित लोगों से प्रतिष्ठित भरणी और रेवती गज योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

हाथी शक्ति, धैर्य, स्मरण और गंभीरता का प्रतीक है। 

ऐसे जातक जीवन की जिम्मेदारियों को संभालने वाले और लंबे समय तक प्रयास करने वाले हो सकते हैं।


गणपति उपासना में प्रचलित मंत्र—


“ॐ गं गणपतये नमः।”


का जप विघ्नों को दूर करने की आध्यात्मिक भावना से किया जाता है। 

किसी विशेष नक्षत्र या ग्रह का उपाय करते समय संबंधित कुंडली का विचार करना उचित है।


गौ योनि : -


गौ योनि सदा उत्साहित और आशावादी, मेहनती, परिश्रम से पीछे न हटने वाले, बात करने में निपुण, स्त्रियों को विशेष रूप से प्रिय, कम आयु , उत्तराभाद्रपदा को गो योनि से जोड़ा जाता है। 

गो यानी गाय को शांति, पालन - पोषण, धैर्य और सेवा का प्रतीक माना जाता है। 

उत्तराभाद्रपदा जातक के स्वभाव में गंभीरता, सहनशीलता और दूसरों के प्रति सहयोग की भावना का संकेत माना जा सकता है।


सर्प योनि का सूक्ष्म स्वभाव  : -


सर्प योनि अत्यंत क्रोधी स्वभाव, अनियंत्रित क्रोध, रूखा स्वभाव, दया और ममता की कमी, मन अस्थिर और चंचल, गम्भीरता से नहीं सोच पाना, खाने और व्यंजन के शौकीन, नुगरे रोहिणी और मृगशीर्ष को सर्प योनि से जोड़ा जाता है। 

सर्प को सूक्ष्मता, रहस्य, संवेदनशीलता और परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। 

ऐसे जातक परिस्थितियों को गहराई से समझने वाले और मानसिक रूप से संवेदनशील हो सकते हैं।


सर्प योनि को समझते समय केवल नकारात्मक अर्थ निकालना उचित नहीं है। 

यह गहरी निरीक्षण शक्ति और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को बदलने की क्षमता का प्रतीक भी हो सकता है। 

रोहिणी और मृगशीर्ष सर्प योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

सर्प रहस्य, सूक्ष्म निरीक्षण, संवेदनशीलता और परिवर्तन का प्रतीक है। 

इस योनि का अर्थ नकारात्मक नहीं है। 

यह गहरी समझ और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता का संकेत भी हो सकता है।


यदि मानसिक अस्थिरता हो तो चंद्र उपासना और शांत मन की साधना उपयोगी मानी जाती है—


“ॐ सोमाय नमः।”


का जप चंद्र देव के प्रति श्रद्धा का सरल मंत्र है।

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श्वान योनि और निष्ठा  : -


आर्द्रा और मूल श्वान योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

कुत्ता निष्ठा, सतर्कता और सुरक्षा का प्रतीक है। 

इस योनि का व्यक्ति अपने विश्वासपात्र लोगों के प्रति अत्यंत समर्पित हो सकता है।


लेकिन विश्वास टूटने पर प्रतिक्रिया तीव्र हो सकती है। 

इस लिए संबंधों में स्पष्ट संवाद और विश्वास बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।  

श्वान योनि बहादुर और साहसी, उत्साही और जोश से परिपूर्ण, मेहनती और परिश्रमी, माता - पिता के सेवक, दूसरों के सहायक, भाई बंधुओं से छोटी - छोटी बात पर लड़ जाने वाले , आर्द्रा और मूल श्वान योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

श्वान निष्ठा, सुरक्षा, सतर्कता और अपने स्वामी के प्रति समर्पण का प्रतीक है। 

ऐसे व्यक्तियों में अपने प्रियजनों के प्रति मजबूत लगाव देखा जा सकता है।


इन जातकों के लिए क्रोध और प्रतिक्रिया पर नियंत्रण महत्वपूर्ण है। 

भगवान शिव की उपासना में प्रचलित—


“ॐ नमः शिवाय।”


का जप मानसिक शांति और आत्मसंयम की साधना के रूप में किया जा सकता है।


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Brother DCP-L2520D Automatic Duplex Laser Printer with 30 Pages Per Minute Print Speed, Multifunction (Print Scan Copy), 2 in 1 (ID) Copy Button, LCD Display, 32 MB Memory, 250 Sheet Paper Tray, USB

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  • Paper Size : A4, Letter, A5, A5 (Long Edge), A6, Executive ; Max paper thickness (in GSM) - 105 GSM ; [Maximum Input Sheet Capacity] - 250 Sheets ; Compatible Ink/Toner : TN-2365 Toner Cartridge ; Additional Printer Function - Print, Scan & Copy ; Power wattage of printer : 510 W
  • Special Features : 2 In 1 ID Copy Feature; Ideal Usage [Recommended Uses of Product]: Small Office, Home Office ;Included Components : Power Cable, USB Cable, Installation CD, Inbox Toner TN-2365 (2600 pages) (needs to be installed) }



मार्जार योनि और स्वतंत्रता  : -


मघा और पूर्वाफाल्गुनी मूषक योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

मूषक सक्रियता, खोज, संग्रह और छोटी - छोटी बातों पर ध्यान देने का प्रतीक है।


ऐसे व्यक्ति संसाधनों को संभालने वाले और परिस्थितियों के भीतर अवसर खोजने वाले हो सकते हैं।

हालांकि अधिक चिंता या छोटी बातों पर अत्यधिक ध्यान देना उनके लिए चुनौती बन सकता है।

मार्जार योनि अत्यंत निडर, बहादुर और हिम्मत वाले, दूसरों के प्रति दुष्ट भाव रखना, समस्त कार्य करने में कुशल, मीठे के शौकिन , मघा और पूर्वाफाल्गुनी मूषक योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

मूषक निरंतर सक्रियता, खोज और संग्रह का प्रतीक है। 

ऐसे व्यक्ति छोटी - छोटी बातों पर ध्यान देकर बड़े परिणाम निकाल सकते हैं।


मघा में पितृपरंपरा का विचार भी जुड़ा हुआ माना जाता है। 

इस लिए माता - पिता, गुरु और पूर्वजों का सम्मान इस प्रकार के जातकों के लिए आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।


मेष योनि का तेज  : -


मेष योनि पराक्रमी और महान योद्धा, मेहनती, धन - दौलत से परिपूर्ण ऐश्वर्यशाली, भोगी तथा दूसरों पर उपकार करने वाले कृत्तिका और पुष्य को मेष योनि से जोड़ा जाता है। 

मेष ऊर्जा, साहस, संघर्ष और सक्रियता का प्रतीक है। 

इस योनि का प्रभाव व्यक्ति को स्पष्टवादी, कार्यशील और परिस्थितियों का सामना करने वाला बना सकता है।


यदि मंगल मजबूत हो तो साहस और नेतृत्व बढ़ सकता है, जबकि मंगल के अशुभ प्रभाव में क्रोध या जल्दबाजी बढ़ने की संभावना मानी जाती है। 

इस लिए ऐसे व्यक्तियों के लिए संयम और धैर्य महत्वपूर्ण गुण हैं। 

कृत्तिका और पुष्य मेष योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

मेष ऊर्जा, साहस और संघर्ष का प्रतीक है। 

ऐसे जातक स्पष्ट निर्णय लेने वाले हो सकते हैं, लेकिन कभी - कभी जल्दबाजी भी कर सकते हैं। 


मंगल की शांति और आत्मसंयम की भावना के लिए—


“ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः।”


का मंत्र पारंपरिक ग्रह - मंत्रों में प्रयुक्त होता है। 

मंत्र - जप श्रद्धा और उचित मार्गदर्शन के साथ करना चाहिए।


मूषक योनि और सक्रिय बुद्धि  : -


मघा और पूर्वाफाल्गुनी मूषक योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

मूषक सक्रियता, खोज, संग्रह और छोटी - छोटी बातों पर ध्यान देने का प्रतीक है।


ऐसे व्यक्ति संसाधनों को संभालने वाले और परिस्थितियों के भीतर अवसर खोजने वाले हो सकते हैं।

हालांकि अधिक चिंता या छोटी बातों पर अत्यधिक ध्यान देना उनके लिए चुनौती बन सकता है। 

मूषक योनि काफी बुद्धिमान और चतुर, अपने काम में तत्पर और सजग, काफी सोच विचार कर और समझदारी से आगे बढने वाले, सदैव सचेत एवं आसानी से किसी पर विश्वास नहीं करने वाले, काफि धनी , मघा और पूर्वाफाल्गुनी मूषक योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

मूषक निरंतर सक्रियता, खोज और संग्रह का प्रतीक है। 

ऐसे व्यक्ति छोटी - छोटी बातों पर ध्यान देकर बड़े परिणाम निकाल सकते हैं।


मघा में पितृपरंपरा का विचार भी जुड़ा हुआ माना जाता है। 

इस लिए माता - पिता, गुरु और पूर्वजों का सम्मान इस प्रकार के जातकों के लिए आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।


सिंह योनि और नेतृत्व  : -


उत्तराफाल्गुनी और धनिष्ठा सिंह योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

सिंह को आत्मविश्वास, नेतृत्व, प्रतिष्ठा और अधिकार का प्रतीक माना जाता है।


इस योनि के जातक सम्मान और अपनी पहचान को महत्व दे सकते हैं। 

नेतृत्व क्षमता अच्छी हो सकती है, लेकिन अहंकार से बचना आवश्यक माना जाता है। 

सिंह योनि धर्मात्मा, स्वाभिमानी, नेक और सरल आचरण व व्यवहार, इरादों के पक्के, अत्यंत साहस और हिम्मत, कुटुम्ब का ख्याल रखने वाले , उत्तराफाल्गुनी और धनिष्ठा सिंह योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

सिंह आत्मविश्वास, नेतृत्व, प्रतिष्ठा और अधिकार का प्रतीक है। 

ऐसे जातक जिम्मेदारी संभालना पसंद कर सकते हैं।


सूर्य उपासना में—


“ॐ आदित्याय नमः।”


का जप श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है। 

नेतृत्व के साथ विनम्रता रखना सिंह - स्वभाव का सर्वोत्तम संतुलन माना जा सकता है।


महिष योनि और कर्मशीलता  : -


हस्त और स्वाती को महिष योनि से जोड़ा जाता है। 

महिष शक्ति, सहनशीलता, श्रम और स्थिरता का प्रतीक है।


ऐसे व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में लंबे समय तक प्रयास करने की क्षमता रखते हैं। 

उनका स्वभाव बाहर से शांत लेकिन भीतर से मजबूत हो सकता है। 

महिष योनि कम बुद्धि वाले, युद्ध में इन्हें सफलता, काम के प्रति बहुत अधिक उत्साही, कई संताने, वात रोगी , हस्त और स्वाती महिष योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

महिष श्रम, सहनशीलता और स्थिर शक्ति का प्रतीक है। 

ऐसे व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में टिके रहने की क्षमता रखते हैं।


हस्त नक्षत्र के संदर्भ में कौशल और कर्म की भावना महत्वपूर्ण मानी जाती है। 

इस लिए हाथ से किए जाने वाले कौशल, सेवा और अनुशासित कार्य इनके लिए सकारात्मक दिशा बन सकते हैं।


व्याघ्र योनि और महत्वाकांक्षा  :-


चित्रा और विशाखा व्याघ्र योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

बाघ साहस, महत्वाकांक्षा, प्रभाव और लक्ष्य पर केंद्रित रहने का प्रतीक है। 

चित्रा और विशाखा व्याघ्र योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

बाघ लक्ष्य, शक्ति, साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है। 

ऐसे जातक अपने लक्ष्य को लेकर गंभीर हो सकते हैं।


परंतु अत्यधिक प्रतिस्पर्धा को क्रोध में बदलने से बचना आवश्यक है। 

गुरु या इष्टदेव की उपासना के साथ संयम रखना उपयोगी आध्यात्मिक अनुशासन हो सकता है।


ऐसे व्यक्ति किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मजबूत प्रयास कर सकते हैं। 

लेकिन अत्यधिक प्रतिस्पर्धा या क्रोध संबंधों में समस्या उत्पन्न कर सकता है। 

व्याध योनि सभी प्रकार के काम में कुशल, स्वतंत्र रूप से काम करने वाले, अपनी प्रशंसा स्वयं करने वाले !


मृग योनि और संवेदनशीलता  : -


अनुराधा और ज्येष्ठा मृग योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

हिरण को संवेदनशीलता, सजगता और कोमलता का प्रतीक माना जाता है। 

हिरण को संवेदनशीलता, सजगता, कोमलता और परिस्थितियों को महसूस करने का प्रतीक माना जाता है।


ऐसे व्यक्ति दूसरों की भावनाओं को जल्दी समझ सकते हैं। 

लेकिन अत्यधिक संवेदनशीलता के कारण चिंता या मानसिक दबाव भी बढ़ सकता है।


ऐसे जातक दूसरों के व्यवहार को जल्दी महसूस कर सकते हैं। 

उन्हें मानसिक संतुलन, नियमित ध्यान और सकारात्मक वातावरण से लाभ मिल सकता है। 

मृग योनि कोमल हृदय, नम्र और प्रेमपूर्ण व्यवहार, शान्त मन, सत विचार एवं सत्य वाचक, आस्थावान, स्वतंत्र विचारों के, लड़ाई - झगड़े दूर रहने वाले, भाई बंधुओं से प्रेम करने वाले !


वानर योनि और चंचल बुद्धि  : -


वानर योनि चंचल स्वभाव, युद्ध के लिये सदा तत्पर, काफी बहादुर और हिम्मत वाले, कामो उत्तेजक, धन व्यस्नी, संतान से सुखी , पूर्वाषाढ़ा और श्रवण वानर योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

वानर चंचलता, बुद्धि, सीखने की क्षमता, सामाजिकता और प्रयोगशीलता का प्रतीक है।


ऐसे जातक नई चीजें सीखने और अलग - अलग अनुभव लेने में रुचि रखते हैं। 

यदि मन स्थिर रखा जाए तो उनकी बहुमुखी प्रतिभा बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती है। 

पूर्वाषाढ़ा और श्रवण वानर योनि से संबंधित माने जाते हैं। 

वानर सीखने, प्रयोग करने, सामाजिकता और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।


ऐसे व्यक्ति अनेक विषयों में रुचि ले सकते हैं। 

उनकी सबसे बड़ी शक्ति बहुमुखी प्रतिभा हो सकती है, जबकि चुनौती मन को एकाग्र रखना हो सकती है।


नकुल योनि : -


नकुल योनि के जातक हर काम में पारंगत एवं कुशलता पूर्वक करने में सक्षम, अत्यंत परोपकारी, विद्या के धनी, माता पिता के भक्त होते है। 

उत्तराषाढ़ा को नकुल योनि से जोड़ा जाता है। 

नकुल साहस, सतर्कता और संकट में सही प्रतिक्रिया का प्रतीक है। 

नकुल को सजगता, साहस और संकट में प्रतिक्रिया देने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है। 


जन्मकुंडली में नक्षत्र योनि का महत्व :-


जन्मकुंडली में सबसे पहले चंद्रमा के नक्षत्र को देखा जाता है। 

चंद्रमा मन का कारक है, इस लिए जन्म नक्षत्र व्यक्ति की मानसिक प्रवृत्ति का महत्वपूर्ण संकेत देता है।

इसके बाद नक्षत्र स्वामी, चंद्रमा की राशि, भावस्थिति, दृष्टि और दशा का विचार किया जाता है। 

यदि चंद्रमा शुभ हो और नक्षत्र स्वामी बलवान हो तो नक्षत्र के सकारात्मक गुण अधिक सहजता से प्रकट हो सकते हैं।

लेकिन किसी व्यक्ति के पूरे जीवन का निर्णय केवल योनि से नहीं किया जा सकता।

जन्मकुंडली में योनि का अध्ययन मुख्यतः चंद्रमा के जन्म नक्षत्र से किया जाता है। 

चंद्रमा मन और भावनाओं का प्रमुख कारक माना जाता है। 

इस लिए जन्म नक्षत्र व्यक्ति की मानसिक प्रवृत्ति समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


यदि चंद्रमा शुभ स्थिति में हो और उसका नक्षत्र स्वामी बलवान हो, तो व्यक्ति की मानसिक स्थिरता और व्यवहार में सकारात्मकता दिखाई देने की संभावना मानी जाती है। 

यदि चंद्रमा पीड़ित हो तो उसी नक्षत्र की योनि से जुड़े गुण असंतुलित रूप में प्रकट हो सकते हैं।


प्रश्नकुंडली में योनि का नक्षत्र योनि विचार :-

 

प्रश्नकुंडली किसी विशेष समय पर पूछे गए प्रश्न की स्थिति का ज्योतिषीय अध्ययन है। 

इस में लग्न, चंद्रमा, नक्षत्र और संबंधित भावों को देखा जाता है।


यदि प्रश्न संबंध, विवाह, साझेदारी या व्यक्ति के स्वभाव से संबंधित हो तो प्रश्न के समय चंद्रमा के नक्षत्र और उसकी योनि को सहायक संकेत के रूप में देखा जा सकता है। 

लेकिन केवल योनि के आधार पर हां या ना का अंतिम निर्णय करना उचित नहीं है।

जब किसी व्यक्ति का प्रश्न हो—

“विवाह होगा या नहीं?”, 

“संबंध ठीक रहेगा या नहीं?”, 

“सामने वाला व्यक्ति कैसा है?”—

तब प्रश्नकुंडली में लग्न, चंद्रमा, सप्तम भाव, सप्तमेश और संबंधित ग्रहों के साथ नक्षत्र का विचार सहायक संकेत दे सकता है।


योनि को केवल एक अतिरिक्त संकेत मानना चाहिए। 

प्रश्नकुंडली में अन्य योगों की उपेक्षा करके केवल योनि से निर्णय देना उचित नहीं है।


गोचर में नक्षत्रों का योनि के प्रभाव :-


गोचर में चंद्रमा लगभग प्रतिदिन नक्षत्र बदलता है। 
इस लिए मुहूर्त और दैनिक मानसिक स्थिति के अध्ययन में नक्षत्र का विचार किया जाता है।

किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए केवल योनि देखकर मुहूर्त निर्धारित नहीं करना चाहिए। 
तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, लग्न और कार्य की प्रकृति का समग्र विचार आवश्यक है।

गोचर में चंद्रमा लगभग प्रतिदिन नक्षत्र बदलता है। 
इस लिए किसी दिन की मानसिक स्थिति, कार्य की शुरुआत या विशेष घटना के लिए नक्षत्र का विचार किया जाता है।

शुभ कार्य के लिए शुभ नक्षत्र चुनने की मुहूर्त परंपरा इसी व्यापक नक्षत्र - विचार से जुड़ी है। 
हालांकि मुहूर्त निर्धारित करते समय केवल योनि नहीं, बल्कि तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, लग्न और संबंधित कार्य की प्रकृति भी देखी जाती है।

गोचर में नक्षत्र योनि :-


गोचर में चंद्रमा लगभग प्रतिदिन नक्षत्र बदलता है। 
इस लिए किसी दिन की मानसिक स्थिति, कार्य की शुरुआत या विशेष घटना के लिए नक्षत्र का विचार किया जाता है।

शुभ कार्य के लिए शुभ नक्षत्र चुनने की मुहूर्त परंपरा इसी व्यापक नक्षत्र - विचार से जुड़ी है। 
हालांकि मुहूर्त निर्धारित करते समय केवल योनि नहीं, बल्कि तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, लग्न और संबंधित कार्य की प्रकृति भी देखी जाती है।

कृष्णमूर्ति पद्धति और नक्षत्र : -


कृष्णमूर्ति पद्धति में नक्षत्र स्वामी और उसके आगे के सूक्ष्म स्तरों को विशेष महत्व दिया जाता है। किसी घटना के फल के लिए संबंधित भावों के संकेतकों का अध्ययन किया जाता है।

कैरियर के लिए 2, 6, 10 और 11 भाव, विवाह के लिए 2, 7 और 11 भाव तथा शिक्षा के लिए 4, 5 और 9 भाव जैसे संकेतकों का अध्ययन किया जा सकता है। 
इस पद्धति में नक्षत्र को केवल स्वभाव का प्रतीक न मानकर घटना - फल की सूक्ष्म कड़ी के रूप में भी देखा जाता है।

वैदिक मंत्रों सहित उपाय : -


नक्षत्र दोष या ग्रह पीड़ा के नाम पर भय पैदा करना उचित नहीं है। 
उपाय का उद्देश्य मन में श्रद्धा, अनुशासन और सकारात्मकता पैदा करना होना चाहिए।

सूर्य के लिए—


“ॐ सूर्याय नमः।”

चंद्रमा के लिए—


“ॐ सोमाय नमः।”

मंगल के लिए—


“ॐ भौमाय नमः।”

बुध के लिए—


“ॐ बुधाय नमः।”

गुरु के लिए—


“ॐ बृहस्पतये नमः।”

शुक्र के लिए—


“ॐ शुक्राय नमः।”

शनि के लिए—


“ॐ शनैश्चराय नमः।”

राहु के लिए—


“ॐ राहवे नमः।”

केतु के लिए—


“ॐ केतवे नमः।”

ये सरल नाम - मंत्र श्रद्धापूर्वक जप के लिए अपनाए जा सकते हैं। 
किसी विशेष वैदिक अनुष्ठान में वैदिक मंत्र का उच्चारण, स्वर और विधि योग्य आचार्य से सीखना अधिक उचित है।

सभी नक्षत्रों के लिए सबसे बड़ा उपाय है—

सत्य बोलना, माता - पिता और गुरु का सम्मान करना, जरूरतमंद की सहायता करना, जीवों के प्रति दया रखना और अपने कर्म को ईमानदारी से करना।
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योनि कूट के महत्वपूर्ण नियम : -


पहला नियम है कि योनि को अकेले देखकर विवाह का निर्णय न किया जाए।

दूसरा नियम है कि वर - वधू के जन्म नक्षत्र और उनसे बनने वाले योनि संबंध को देखा जाए।

तीसरा नियम है कि समान योनि को सामान्यतः अनुकूल माना जाता है।

चौथा नियम है कि परंपरागत योनि - विरोध को अन्य गुणों के साथ मिलाकर देखा जाए।

पांचवां नियम है कि नाड़ी, भकूट, ग्रह मैत्री, गण और सप्तम भाव की स्थिति को भी समान महत्व दिया जाए।

छठा नियम है कि यदि किसी एक कूट में कमी हो तो पूरी जन्मकुंडली का समग्र अध्ययन किया जाए।

नक्षत्र और योनि के पारंपरिक उपाय :-


नक्षत्र संबंधी उपाय करते समय सबसे पहले संबंधित नक्षत्र के देवता और ग्रह स्वामी का विचार करना चाहिए। 
सामान्य रूप से अपने जन्म नक्षत्र के दिन ईश्वर की उपासना, मंत्र - जप, दान, जरूरतमंद की सहायता, माता - पिता और गुरु का सम्मान तथा सदाचार को शुभ उपाय माना जाता है।

चंद्रमा कमजोर होने की स्थिति में मन को शांत रखने के लिए ध्यान, प्रार्थना, नियमित दिनचर्या और सेवा उपयोगी हो सकती है। 
संबंधित ग्रह के अनुसार दान या मंत्र - जप की परंपरा भी अपनाई जाती है।

रत्न धारण करने जैसे उपाय बिना पूरी जन्मकुंडली देखे नहीं करने चाहिए, क्योंकि एक व्यक्ति के लिए शुभ ग्रह दूसरे व्यक्ति की कुंडली में प्रतिकूल फल दे सकता है। 
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संदेश :-


नक्षत्रों की योनि मनुष्य के स्वभाव को समझने की एक प्राचीन प्रतीकात्मक व्यवस्था है। 
अश्व गति सिखाता है, गज धैर्य, मेष साहस, सर्प सूक्ष्मता, श्वान निष्ठा, मार्जार स्वतंत्रता, मूषक सक्रियता, सिंह नेतृत्व, महिष सहनशीलता, व्याघ्र महत्वाकांक्षा, मृग संवेदनशीलता, वानर बुद्धि और प्रयोगशीलता, नकुल सजगता तथा गो करुणा और पालन - पोषण की भावना का प्रतीक बन सकता है। 
नक्षत्रों की योनि केवल पशु - प्रतीकों की सूची नहीं है। 
भारतीय ज्योतिषीय परंपरा में यह व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति, मानसिक प्रतिक्रिया, संबंधों में सामंजस्य और स्वभाव को समझने का एक प्रतीकात्मक माध्यम है।

जन्मकुंडली व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति का अध्ययन कराती है, प्रश्नकुंडली तत्काल परिस्थिति का संकेत देती है और गोचर समय के परिवर्तन को समझने में सहायता करता है। 
नक्षत्रपद्धति और कृष्णमूर्ति पद्धति इन संकेतों को और सूक्ष्म रूप से देखने का मार्ग प्रदान करती हैं।

जन्मकुंडली में चंद्रमा का नक्षत्र व्यक्ति की मानसिक प्रकृति का संकेत देता है, प्रश्नकुंडली तत्काल परिस्थिति की दिशा समझने में सहायक हो सकती है और गोचर समय के परिवर्तन का संकेत देता है। वहीं नक्षत्र - योनि का अध्ययन इन सभी में एक सहायक स्तर जोड़ सकता है।

अंततः ज्योतिष का उद्देश्य भय नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, विवेक, संयम और सही कर्म की प्रेरणा होना चाहिए। 
ग्रह और नक्षत्र अपनी - अपनी प्रतीकात्मक भाषा में संभावनाओं के संकेत दे सकते हैं, लेकिन मनुष्य का पुरुषार्थ, संस्कार, निर्णय और कर्म ही उसके जीवन की दिशा को वास्तविक रूप से आकार देते हैं। 
सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि ज्योतिषीय संकेतों को विवेकपूर्वक समझा जाए। 
नक्षत्र संभावना और प्रवृत्ति का संकेत दे सकते हैं, लेकिन मनुष्य का व्यवहार उसके संस्कार, शिक्षा, अनुभव, कर्म और निर्णयों से भी निर्मित होता है।

इसी लिए नक्षत्र की योनि को जानने का सर्वोत्तम फल यह है कि व्यक्ति अपने स्वभाव को पहचाने, अपनी कमजोरी को सुधारने का प्रयास करे, संबंधों में सामंजस्य रखे और ईश्वर - स्मरण के साथ अपने कर्मपथ पर आगे बढ़े। 
यही नक्षत्र - विज्ञान की सार्थक साधना है। 
इस लिए नक्षत्रों की योनि का वास्तविक उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि स्वभाव को समझना, संबंधों में सामंजस्य बढ़ाना, अपनी कमजोरियों पर कार्य करना और जीवन में संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। 
यही नक्षत्र - विचार की सार्थक दिशा है। !!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

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जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -

श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,

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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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