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Tuesday, August 25, 2026

मुकदमे में विजय या पराजय :

 मुकदमे में विजय या पराजय  :

मुकदमे में विजय या पराजय :

जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली, गोचर, दशा और शास्त्रीय विधान का विस्तृत विवेचन !

श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या, श्री खगोड़शास्त्रविद्या ( श्री नक्षत्रपद्धतिविधा ), श्री कृष्णमूर्तिपद्धतिविधा, श्री अंकशास्त्रविधा, श्री हस्तरेखाशास्त्रविधा, श्री सामुद्रिकशास्त्रविधा, श्री वास्तुशास्त्रविधा, श्री ऋग्वेद, श्री भविष्यपुराण, श्री भृगु संहिता तथा श्री गर्ग संहिता आदि परंपरागत ग्रंथ - परंपराओं के संदर्भ में जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर से मुकदमे में विजय अथवा पराजय का विचार कैसे किया जाता है—

इस विषय का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत है।

दैनिक जीवन में होने वाली समस्त हार - जीत के प्रश्नों को वाक् युद्ध, द्यूत युद्ध, मदन युद्ध, मल्ल या द्वन्द युद्ध, सैन्य युद्ध, पांच प्रकार के युद्धों के वर्ग में रखा गया है। 


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{ About this item

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मुकदमाबाजी, फौजदारी, विवाद, चुनाव एवं अन्य प्रकार के झगडे़ - झंझट, इन सभी का समावेश इन युद्धों में किया गया है, जिसके आधार पर जब कोई जातक प्रश्न करता है तो ज्योतिषी प्रश्न कुण्डली के माध्यम से हार या जीत का उत्तर देता है।

प्राचीन ग्रंथों में पांच प्रकार के प्रमुख युद्धों का उल्लेख है, वाक् युद्ध, द्यूत युद्ध, मदन युद्ध, मल्ल या द्वन्द युद्ध, सैन्य युद्ध। 

वाक् युद्ध का अभिप्राय किसी के साथ वाद - विवाद, शास्त्रार्थ, किसी भी चीज का खण्डन या मण्डन, किसी विषय के पक्ष एवं विपक्ष में मौखिक तर्क इत्यादि। 

दो पहलवानों या योद्धाओं की भिड़न्त को द्वन्द युद्ध, दो देश की सेनाओं की लड़ाई को सैन्य युद्ध कहते हैं।


यह तो हम सभी जानते हैं कि जो व्यक्ति मुकद्दमे दायर करता है, उसे वादी तथा जिस पर मुकद्दमा या अभियोग चलाया जाता है वह प्रतिवादी कहलाता है। 

प्रश्न कुण्डली में नवम स्थान से द्वितीय स्थान तक 6 भाव वादी का और तृतीय स्थान से अष्टम स्थान पर्यन्त 6 भाव प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसका विचार मुकदमे से संबंधित प्रश्न पूछने पर किया जाता है।

मुकदमे का ज्योतिषीय विचार कहाँ से प्रारंभ होता है ?


जब किसी व्यक्ति का प्रश्न हो कि “मुकदमे में मेरी जीत होगी या हार?”, 

तब केवल एक ग्रह को देखकर निर्णय करना उचित नहीं है। 

ज्योतिषीय पद्धति में पहले यह देखा जाता है कि विवाद किस प्रकार का है, विरोधी कौन है, मामला किस विषय से संबंधित है और न्यायालयीन प्रक्रिया किस स्तर पर है।


जन्मकुंडली में लग्न और लग्नेश प्रश्नकर्ता का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

परंपरागत रूप से षष्ठ भाव शत्रु, ऋण, रोग, विवाद और संघर्ष से संबंधित माना जाता है। 

सप्तम भाव सामने वाले व्यक्ति अथवा विरोधी पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है। 

अष्टम भाव छिपी हुई बात, अचानक परिवर्तन, बाधा, संकट और मामले की जटिलता से संबंधित माना जाता है।


नवम भाव धर्म, न्याय, सिद्धांत, भाग्य और उच्च मार्गदर्शन का संकेत माना जाता है। 

दशम भाव कर्म, अधिकार, निर्णय और प्रतिष्ठा से जुड़ा है, जबकि एकादश भाव लाभ, सफलता और इच्छा - पूर्ति का संकेत माना जाता है।


इसी लिए मुकदमे के प्रश्न में लग्न, षष्ठ, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम और एकादश भाव का समग्र विचार अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।


षष्ठ भाव — शत्रु और विवाद का प्रमुख भाव :


मुकदमे में सबसे पहले षष्ठ भाव का विचार किया जाता है। 

यदि षष्ठ भाव, षष्ठेश तथा उससे संबंधित ग्रह मजबूत हों तो व्यक्ति में विरोध का सामना करने और संघर्ष करने की क्षमता का संकेत माना जाता है।


लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म नियम समझना आवश्यक है।


मजबूत षष्ठ भाव का अर्थ हमेशा मुकदमे में हार नहीं होता। 

क्योंकि षष्ठ भाव स्वयं शत्रु और विवाद का भाव है, इस लिए इसकी स्थिति का फल इस बात पर निर्भर करता है कि वह व्यक्ति के लिए किस प्रकार कार्य कर रहा है।


यदि प्रश्नकर्ता की कुंडली में संघर्ष - संबंधी भाव उसके पक्ष में सक्रिय हों और विरोधी पक्ष से संबंधित संकेत कमजोर हों, तो विजय की संभावना की पारंपरिक व्याख्या की जा सकती है।


सप्तम भाव — विरोधी पक्ष :


मुकदमे में सामने वाले व्यक्ति को सप्तम भाव से देखा जाता है। 

सप्तम भाव का स्वामी, उसमें स्थित ग्रह, उस पर पड़ने वाली दृष्टि तथा उसकी दशा - अंतरदशा की स्थिति से विरोधी पक्ष की शक्ति का अनुमान लगाया जाता है।


यदि सप्तम भाव अत्यधिक बलवान हो और प्रश्नकर्ता के लग्न तथा लाभ भाव कमजोर हों, तो संघर्ष कठिन होने की संभावना मानी जा सकती है।


इस के विपरीत यदि लग्नेश मजबूत हो, लाभ भाव सहयोगी हो और विरोधी पक्ष के संकेत कमजोर हों, तो प्रश्नकर्ता की स्थिति बेहतर मानी जा सकती है।


इस लिए लग्न बनाम सप्तम भाव का तुलनात्मक अध्ययन मुकदमे की कुंडली में महत्वपूर्ण माना जाता है।


दशम भाव — निर्णय और न्यायालयीन परिणाम :


दशम भाव को कर्म, अधिकार और प्रतिष्ठा का भाव माना जाता है। 

न्यायालयीन मामले में यह अंतिम निर्णय और मामले के सार्वजनिक परिणाम के विचार में महत्वपूर्ण हो सकता है।


यदि दशमेश शुभ स्थिति में हो, दशम भाव पर शुभ प्रभाव हो और दशा - गोचर उसका समर्थन कर रहे हों, तो मामले के परिणाम के लिए अनुकूल समय माना जा सकता है।


लेकिन दशम भाव को अकेले देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। 

उसे लग्न, षष्ठ, सप्तम और एकादश भाव से जोड़कर देखना आवश्यक है।

एकादश भाव — सफलता और लाभ :

एकादश भाव को लाभ, सफलता, उपलब्धि और इच्छा - पूर्ति का भाव माना जाता है।

मुकदमे के संदर्भ में यदि एकादश भाव और उसका स्वामी मजबूत हों तथा दशा - अंतरदशा में उनका संबंध लग्न, षष्ठ, दशम आदि महत्वपूर्ण भावों से बने, तो इसे अनुकूल संकेत माना जा सकता है।

यही कारण है कि मुकदमे के परिणाम में केवल “छठा भाव” नहीं बल्कि 6-10-11 जैसे भाव-संबंधों को परंपरागत फलित - ज्योतिष में विशेष महत्व दिया जाता है।

अष्टम और द्वादश भाव का महत्व :

अष्टम भाव मुकदमे में अचानक परिस्थिति बदलने, गुप्त तथ्य, संकट, विलंब और मामले की जटिलता का संकेत दे सकता है।

द्वादश भाव खर्च, हानि, अलगाव और परिणाम के किसी हिस्से के हाथ से निकलने का संकेत माना जाता है।

यदि मुकदमे से संबंधित दशा में अष्टम और द्वादश भाव अत्यधिक सक्रिय हों, तो व्यक्ति को अतिरिक्त खर्च, विलंब अथवा अप्रत्याशित परिस्थिति का सामना करना पड़ सकता है—

ऐसी पारंपरिक ज्योतिषीय व्याख्या की जाती है।

लेकिन यह भी निश्चित हार का नियम नहीं है। 

पूरी कुंडली देखना आवश्यक है।





कौन जीतता है मुकदमा :

प्रश्न कुण्डली में 9वें स्थान से दूसरे स्थान तक समस्त शुभ ग्रह बलवान होकर बैठे हों तो मुकद्दमे में वादी की जीत होती है। 

यदि तीसरे स्थान से 8वें स्थान तक समस्त शुभ ग्रह बलवान् होकर बैठे हों, तो प्रतिवादी की जीत होती है। 

मिश्रित ग्रहों के बैठने पर दोनों पक्षों में आपस में फैसला हो जाता है।


ग्रहों का मुकदमे पर प्रभाव :

सूर्य :

सूर्य को अधिकार, शासन, प्रतिष्ठा, प्रशासन और सत्ता का कारक माना जाता है। 

सरकारी संस्था, प्रशासनिक विवाद अथवा अधिकार से जुड़े मामलों में सूर्य की स्थिति महत्वपूर्ण हो सकती है।

चंद्रमा :

चंद्रमा मन, परिस्थिति और मानसिक स्थिरता का प्रतिनिधित्व करता है। 

मुकदमा लंबे समय तक चलने पर व्यक्ति की मानसिक स्थिति और निर्णय क्षमता को समझने में चंद्रमा का विचार किया जाता है।

मंगल :

मंगल साहस, संघर्ष, भूमि, शक्ति और आक्रामकता का कारक माना जाता है। 

भूमि - विवाद अथवा तीखे संघर्ष वाले मामलों में मंगल की भूमिका विशेष रूप से देखी जाती है।

बुध :

बुध बुद्धि, तर्क, लेखन, दस्तावेज, गणना और संचार का कारक माना जाता है। 

कागजात और दस्तावेजों पर आधारित मामलों में बुध की स्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है।

गुरु :

गुरु ज्ञान, धर्म, न्याय, सलाह और सद्बुद्धि का प्रतिनिधि माना जाता है। 

गुरु की शुभ स्थिति व्यक्ति को उचित मार्गदर्शन और विवेक की ओर ले जाने वाली मानी जाती है।

शुक्र :

शुक्र समझौता, संबंध, सामंजस्य और सुविधा का कारक माना जाता है। 

कुछ मामलों में मुकदमे की बजाय समझौते की संभावना के संकेतों में शुक्र को देखा जाता है।

शनि :

शनि न्याय, कर्मफल, कानून, विलंब और दंड का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। 

न्यायालयीन मामलों में शनि की दशा या गोचर के समय मामले के लंबा खिंचने अथवा निर्णय में विलंब की संभावना की पारंपरिक व्याख्या की जाती है।

राहु - केतु :

राहु को भ्रम, अचानक परिवर्तन, असामान्य परिस्थिति और जटिलता से तथा केतु को अलगाव, कटाव और अप्रत्याशित मोड़ से जोड़ा जाता है। 

न्यायालयीन मामलों में इनकी स्थिति को सावधानीपूर्वक देखना चाहिए।




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महादशा, अंतरदशा और प्रत्यंतरदशा :

कुंडली में योग होना और उस योग का फल देने का समय आना—दो अलग बातें हैं।

इसी लिए महादशा, अंतरदशा और प्रत्यंतरदशा का विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जिस ग्रह की दशा चल रही हो, वह किन भावों का स्वामी है, किस भाव में स्थित है, किस नक्षत्र में है, किन ग्रहों से संबंधित है और उससे कौन - कौन से भाव सक्रिय हो रहे हैं—

इन सबका अध्ययन किया जाता है।

यदि दशा में मुकदमे से संबंधित 6, 10 और 11 भाव सक्रिय हों तथा कुंडली के अन्य संकेत भी सहयोगी हों, तो परिणाम की दृष्टि से वह अवधि महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।

यदि 8 और 12 भाव अत्यधिक सक्रिय हों तो विलंब, खर्च अथवा अप्रत्याशित परिस्थिति का संकेत माना जा सकता है।

गोचर का विधान :

जन्मकुंडली स्थायी आधार देती है, दशा समय का संकेत देती है और गोचर वर्तमान परिस्थिति को सक्रिय करने वाला माना जाता है।

शनि का गोचर लंबे संघर्ष, धैर्य और विलंब की परीक्षा से जोड़ा जाता है।

गुरु का गोचर संरक्षण, अवसर और विस्तार का संकेत माना जाता है।

मंगल का गोचर विवाद को तीव्र कर सकता है।

राहु - केतु अचानक परिस्थितियों में परिवर्तन का संकेत दे सकते हैं।

लेकिन गोचर को जन्मकुंडली और दशा से अलग करके नहीं देखना चाहिए।

प्रश्नकुंडली द्वारा मुकदमे का विचार :

यदि व्यक्ति का जन्मसमय निश्चित न हो तो प्रश्न ज्योतिष की परंपरा में प्रश्न पूछे जाने के समय की कुंडली का विचार किया जाता है।

प्रश्नकुंडली में लग्न प्रश्नकर्ता का प्रतिनिधित्व करता है और सप्तम भाव विरोधी पक्ष का। 

षष्ठ भाव विवाद और शत्रुता का संकेत देता है। 

दशम भाव निर्णय तथा एकादश भाव परिणाम और लाभ की दिशा में देखा जा सकता है।

यहाँ भी मूल सिद्धांत यही है कि एक ही योग से निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

मुकदमा जीतने के प्रश्न कुण्डली के आधार पर योग :

प्रश्न लग्न वादी का और लग्न से सप्तम स्थान प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

लग्न में शुभ ग्रह या लग्नेश हों अथवा लग्न पर शुभ ग्रह और लग्नेश की दृष्टि हो, तो मुकद्दमे में वादी की जीत होती है। 

यदि सप्तम स्थान में शुभ ग्रह हों या सप्तमेश हो अथवा सप्तम पर शुभ ग्रह की और सप्तमेश दृष्टि हो, तो प्रतिवादी की जीत होती है। 

प्रश्न लग्न में क्रूर ग्रह हों, तो प्रश्नकर्त्ता मुकद्दमे में जीतता है और यदि सप्तम स्थान में क्रूर ग्रह हों, तो उसका शत्रु जीत जाता है। 

लग्नेश वक्री हो तो वादी की हार होती है, सप्तमेश वक्री हो तो प्रतिवादी की हार होती है। 

लग्न और सप्तम, दोनों स्थानों में पापग्रह हों तो जिस स्थान में अधिक बलवान ग्रह होगा, उससे सम्बन्धित पक्ष की जीत होगी। 

भाग्य स्थान पर दो पाप ग्रह हों तो प्रश्नकर्ता की हार और दो या उससे अधिक शुभ ग्रह हों तो जीत होती है।

कृष्णमूर्ति पद्धति और नक्षत्र पद्धति :

कृष्णमूर्ति पद्धति में ग्रहों के साथ नक्षत्र स्वामी और सब - लॉर्ड को अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर महत्व दिया जाता है।

मुकदमे के प्रश्न में संबंधित भावों के कस्पल सब-लॉर्ड किन भावों को सूचित करते हैं, यह देखा जाता है। 

6, 10 और 11 से संबंधित संकेत अनुकूल परिणाम की दिशा में देखे जा सकते हैं, जबकि 8 और 12 के संबंधों को परिस्थिति के अनुसार समझा जाता है।

नक्षत्र पद्धति में ग्रह जिस नक्षत्र में स्थित है, उसके स्वामी और उसके द्वारा सूचित भावों का भी विचार किया जाता है।

अंकशास्त्र, हस्तरेखा और सामुद्रिक शास्त्र :

अंकशास्त्र में जन्मतिथि से प्राप्त मूलांक, भाग्यांक और संबंधित समय के अंकीय प्रभावों का पारंपरिक अध्ययन किया जाता है।

हस्तरेखा में भाग्यरेखा, मस्तिष्करेखा, जीवनरेखा, सूर्यरेखा तथा पर्वतों का अध्ययन करके व्यक्ति की संघर्षशीलता, निर्णय क्षमता और परिस्थितियों से निपटने की प्रवृत्ति के संकेत खोजे जाते हैं।

सामुद्रिक शास्त्र में शरीर के विभिन्न लक्षणों के पारंपरिक अर्थों का अध्ययन किया जाता है।

इन पद्धतियों को मुख्य जन्मकुंडली का प्रमाणित विकल्प नहीं, बल्कि अलग - अलग पारंपरिक संकेत - पद्धतियों के रूप में देखना अधिक उचित है।

वास्तु और मुकदमे की परिस्थिति :

वास्तुशास्त्र में भवन के मुख्य द्वार, दिशाओं, ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायव्य आदि का विचार किया जाता है।

यदि व्यक्ति न्यायालयीन तनाव से गुजर रहा हो तो घर में स्वच्छता, प्रकाश, व्यवस्थित दस्तावेज और शांत वातावरण बनाए रखना व्यावहारिक रूप से भी लाभकारी है।

धार्मिक दृष्टि से पूजा, प्रार्थना और सत्कर्म व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्रदान कर सकते हैं। 

परंतु वास्तु को न्यायालय के निर्णय का निश्चित कारण अथवा निश्चित समाधान मानना उचित नहीं है।

उपाय :

परंपरागत ज्योतिषीय उपायों में व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुसार सूर्य को अर्घ्य देना, इष्टदेव की उपासना, हनुमानजी का स्मरण, शनि संबंधी प्रार्थना, गुरुजनों का सम्मान, दान - पुण्य, सत्य बोलना और धर्माचरण कर सकता है।

मुकदमे के समय सबसे बड़ा उपाय यह भी है कि व्यक्ति झूठे दस्तावेज न बनाए, झूठी गवाही न दे, विरोधी के प्रति अन्याय न करे और अपने अधिवक्ता को सही तथ्य बताए।

शास्त्रीय दृष्टि से धर्म का मूल तत्व सत्य और उचित आचरण है। 

इस लिए किसी भी ग्रह - उपाय से ऊपर सत्यनिष्ठ व्यवहार को रखना चाहिए।

निष्कर्ष :

मुकदमे में जीत अथवा हार का ज्योतिषीय विचार करते समय केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि “कौन सा ग्रह अच्छा है ?”

वास्तविक अध्ययन में लग्न और लग्नेश, षष्ठ और षष्ठेश, सप्तम और सप्तमेश, अष्टम, नवम, दशम, एकादश, संबंधित ग्रह, नक्षत्र, महादशा - अंतरदशा, गोचर और प्रश्नकुंडली को एक साथ देखना चाहिए।

यदि प्रश्नकर्ता के पक्ष में लग्न, षष्ठ, दशम और एकादश के मजबूत संबंध हों तथा दशा - गोचर उनका समर्थन करें, तो पारंपरिक ज्योतिष में संघर्ष में सफलता के संकेत माने जा सकते हैं।

यदि सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव विरोधी रूप से अधिक सक्रिय हों तथा लग्न और लाभ भाव कमजोर हों, तो संघर्ष कठिन, लंबा या खर्चीला होने की संभावना मानी जा सकती है।

फिर भी किसी भी ज्योतिषीय पद्धति से न्यायालय का निर्णय निश्चित रूप से 100 प्रतिशत बताने का दावा करना उचित नहीं है। 

वास्तविक निर्णय न्यायालय कानून, प्रमाण, दस्तावेज, गवाह और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर करता है।

अतः शास्त्रीय ज्योतिष का श्रेष्ठ संदेश यही माना जा सकता है—

“ग्रह समय और परिस्थिति के संकेत देते हैं, दशाएं फल के सक्रिय होने का समय बताती हैं, गोचर वर्तमान स्थिति को जागृत करता है; परंतु मनुष्य का सत्य आचरण, उचित कर्म, प्रमाण और न्यायिक व्यवस्था ही वास्तविक जीवन के परिणाम का आधार बनते हैं।”

इस लिए मुकदमे में ज्योतिषीय संकेतों के साथ सत्य, धैर्य, विवेक, उचित कानूनी सलाह और धर्मपूर्ण आचरण को ही सर्वोच्च महत्व देना चाहिए। ॥ सत्यं वद । धर्मं चर ॥

🌸💯⭐🙏🏻 सत्य की विजय हो, धर्म की विजय हो, अन्याय का नाश हो। 🙏🏻⭐🌸
🙏हर हर महादेव हर...!!
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जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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