सभी ज्योतिष मित्रों को मेरा निवेदन हे आप मेरा दिया हुवा लेखो की कोपी ना करे में किसी के लेखो की कोपी नहीं करता, किसी ने किसी का लेखो की कोपी किया हो तो वाही विद्या आगे बठाने की नही हे कोपी करने से आप को ज्ञ्नान नही मिल्त्ता भाई और आगे भी नही बढ़ता , आप आपके महेनत से तयार होने से बहुत आगे बठा जाता हे धन्यवाद ........
जय द्वारकाधीश
।। श्री ऋग्वेद के अनुसार दाम्पत्य जीवन और ज्योतिष विद्या शास्त्र में बताए फल ।।
हमारे हिन्दू धर्म के वेदों में ही ऋग्वेद के अनुसार दाम्पत्य जीवन और ज्योतिष शास्त्र फलकथन ।
सूर्य, शनि, राहु अलगाववादी स्वभाव वाले ग्रह हैं ।
वहीं मंगल व केतु मारणात्मक स्वभाव वाले ग्रह है ।
ज्योतिषाचार्य पं. प्रभुलाल वोरिया ने बताया कि ये सभी दाम्पत्य - सुख के लिए हानिकारक होते हैं।
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जैसे : -
१.- यदि सप्तम भाव पर राहु, शनि व सूर्य की दृष्टि हो एवं सप्तमेश अशुभ स्थानों में हो ।
एवं शुक्र पीड़ित व निर्बल हो तो व्यक्ति को दाम्पत्य - सुख नहीं मिलता।
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२.- यदि सूर्य - शुक्र की युति हो ।
और व सप्तमेश निर्बल व पीड़ित हो ।
एवं सप्तम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो ।
तो व्यक्ति को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता है।
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३.- यदि लग्न में शनि स्थित हो और सप्तमेश अस्त, निर्बल या अशुभ स्थानों में हो ।
तो जातक का विवाह विलम्ब से होता है ।
और व जीवनसाथी से उसका मतभेद रहता है।
और सप्तमेश पाप ग्रहों के साथ छ्ठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो तो जातक के तलाक की संभावना होती है।
५.- यदि लग्न में मंगल हो व सप्तमेश अशुभ भावों में स्थित हो ।
और व द्वितीयेश पर मारणात्मक ग्रहों का प्रभाव हो ।
तो पत्नी की मृत्यु के कारण व्यक्ति को दाम्पत्य - सुख से वंचित होना पड़ता है।
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६.- यदि किसी स्त्री की जन्मपत्रिका में गुरु पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो ।
सप्तमेश पाप ग्रहों से युत हो एवं सप्तम भाव पर सूर्य, शनि व राहु की दृष्टि हो ।
तो ऐसी स्त्री को दाम्पत्य सुख प्राप्त नहीं होता.!!
!!!!! शुभमस्तु !!!
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