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जय द्वारकाधीश
वरद तिलकुंद चतुर्थी
श्री तिलकुंद चतुर्थी — वरद चतुर्थी का दिव्य माहात्म्य जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर के ग्रहों के अनुसार फल, नियम एवं उपाय :
माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी ऐसी ही अत्यंत शुभ तिथि है, जिसे अनेक क्षेत्रों में तिलकुंद चतुर्थी, वरद चतुर्थी, विनायक चतुर्थी तथा माघी गणेश जयंती के नाम से जाना जाता है।
माघ महीने की शुरुआत हो चुकी है।
इस माह का विशेष महत्व है और इस खास महीने में कई त्योहार पड़ते हैं इसी में वरद तिल चतुर्थी भी है।
माघ महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को तिल कुंद चतुर्थी या वरद तिल चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है।
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| { Theme | Idol |
| Brand | Caristo |
| Colour | Gold |
| Style | Antique |
| Material | Metal |
| Product Dimensions | 6L x 2W x 8H Centimeters |
| Cartoon Character | Ganesha |
| Number of Pieces | 1 |
| Finish Type | Glossy |
| Item Weight | 200 Grams } |
{ About this item
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‘वरद’ अर्थात वर प्रदान करने वाली।
इस लिए इस चतुर्थी को श्रद्धा, नियम और शुद्ध भाव से
भगवान श्रीगणेश का पूजन करने से भक्त अपनी बुद्धि, विवेक, कार्यसिद्धि, विघ्ननाश और मनोकामना की पूर्ति के लिए गणपति से प्रार्थना करता है।
वरद तिल चतुर्थी व्रत भगवान गणेश को समर्पित है।
इस दिन गणेश जी की पूजा तिल और कुंद के फूलों से किए जाने का विधान है।
सनातन परंपरा में श्रीगणेश को विघ्नहर्ता, सिद्धिदाता, बुद्धिप्रदाता और मंगलकर्ता माना गया है।
किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन करने की परंपरा इसी भाव को प्रकट करती है।
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तिलकुंद चतुर्थी का नाम क्यों ?
इस चतुर्थी के साथ तिल और कुंद पुष्प का विशेष संबंध माना जाता है।
अनेक परंपराओं में इस दिन तिल के लड्डू या तिल - गुड़ से बने पदार्थ भगवान गणेश को अर्पित किए जाते हैं।
कुंद पुष्प की भी पूजा में विशेष परंपरा मिलती है।
इस लिए माघ शुक्ल चतुर्थी को तिल और कुंद से संबंधित होने के कारण तिलकुंद चतुर्थी कहा जाता है।
वरद तिल चतुर्थी फरवरी को मनाया जाएगा।
तिल और कुंद के फूल श्रीगणेश को अतिप्रिय है।
कुछ लोग इस दिन गणेश जी को भोग के रूप में लड्डू भी अर्पित करते हैं।
वरद तिल चतुर्थी तिथि :
माघ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि आरंभ: फरवरी , प्रातः11:38 से ।
माघ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि समाप्त: फरवरी , प्रातः 09:14 पर ।
वरद तिल चतुर्थी का पूजा मुहूर्त :
फरवरी , प्रातः 11:38 से दोपहर 01:40 तक...!
इस तरह वरद तिल चतुर्थी का व्रत 1...!
फरवरी को रखा जाएगा।
शास्त्र विहित मत मानें तो जिस दिन चतुर्थी तिथि लगी है चतुर्थी का व्रत भी उसी दिन से शुरू होगा।
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वरद तिल चतुर्थी पर गणेश जी की पूजा का महत्व :
माघ तिलकुंद चतुर्थी पर भगवान गणेश और चंद्र देव की पूजा से मन को शांति और सुख मिलता है।
इस दिन व्रत रखने से गणेश जी अपने भक्तों के सभी कष्ट दूर करते हैं और धन, विद्या, बुद्धि और ऐश्वर्य का आशीर्वाद देते हैं।
रिद्धि - सिद्धि की भी प्राप्ति होती है और जीवन के सभी संकट दूर होते हैं।
भगवान श्रीगणेश और वरद चतुर्थी :
पुराणिक एवं लोक - परंपराओं में माघ शुक्ल चतुर्थी को भगवान श्रीगणेश के विशेष प्राकट्य अथवा जन्मोत्सव से जोड़ा गया है।
इसी कारण इस दिन गणेश जयंती के रूप में भी उत्सव मनाया जाता है।
इस तिथि का मूल संदेश है—
“जहाँ बुद्धि है, वहाँ सही निर्णय है; जहाँ सही निर्णय है, वहाँ विघ्नों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति है।”
इस लिए तिलकुंद चतुर्थी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि अपने जीवन में विवेक, संयम और शुभ संकल्प स्थापित करने का अवसर भी मानी जा सकती है।
गणेश जी की पूजा से होती है हर मनोकामना पूरी :
पंडित पंडारामा प्रभु राज्यगुरु के मुताबिक संकष्टी चतुर्थी निकल चुकी है।
संकष्टी चतुर्थी को भगवान श्री गणेश का प्राकट्य दिवस माना जाता है।
इसके बाद आने वाली वरद तिल कुंड चतुर्थी भी अपना विशेष महत्व रखती है।
आगामी शुक्रवार को भगवान श्री गणेश की पूजा का विशेष महत्व रहेगा।
इस दिन पूजा करने से भक्तों की मनोकामना पूरी होगी।
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जन्मकुंडली के अनुसार तिलकुंद चतुर्थी का फल :
व्यक्ति की जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति, भाव, राशि, नक्षत्र, दशा - अंतर्दशा तथा वर्तमान गोचर को देखकर फल की विशेष व्याख्या की जाती है।
सूर्य :
यदि जन्मकुंडली में सूर्य कमजोर हो अथवा सूर्य से संबंधित कार्यों में बाधा हो, तो इस दिन श्रीगणेश पूजन के साथ सूर्यदेव को अर्घ्य देना आत्मबल, निर्णय क्षमता और कार्यक्षमता के लिए शुभ साधना माना जा सकता है।
विशेष रूप से पिता, शासन, प्रतिष्ठा, नेतृत्व और आत्मविश्वास से जुड़े विषयों में शुभ संकल्प करना उपयोगी माना जाता है।
चंद्रमा :
चतुर्थी तिथि का संबंध गणेश उपासना से है और कई परंपराओं में इस दिन चंद्र पूजन का भी महत्व बताया गया है।
यदि जन्मकुंडली में चंद्रमा कमजोर हो, मन अस्थिर रहता हो, निर्णय लेने में भ्रम रहता हो अथवा मानसिक चिंता अधिक रहती हो, तो गणेश मंत्र का जाप और शांतिपूर्वक पूजा करना आध्यात्मिक रूप से सहायक माना जाता है।
बुध :
भगवान श्रीगणेश को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है।
इस लिए यदि कुंडली में बुध पीड़ित या कमजोर हो तो इस दिन गणेश उपासना विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है।
विद्यार्थी, लेखक, शिक्षक, व्यापारी, वक्ता, सलाहकार तथा गणना और संचार से जुड़े लोगों के लिए यह दिन विशेष साधना का अवसर बन सकता है।
गुरु :
यदि जन्मकुंडली में गुरु कमजोर हो अथवा शिक्षा, संतान, ज्ञान, धर्म और मार्गदर्शन से संबंधित विषयों में बाधा दिखाई दे, तो गणेश पूजन के साथ गुरुजनों का सम्मान, पीले पदार्थ का दान और ज्ञान प्राप्ति का संकल्प करना शुभ माना जा सकता है।
शनि :
यदि शनि के कारण कार्यों में विलंब, निराशा, बार-बार बाधा या लंबे समय तक संघर्ष दिखाई दे, तो तिलकुंद चतुर्थी पर गणेश आराधना के साथ जरूरतमंद व्यक्ति को तिल, अन्न अथवा भोजन का दान करना पुण्यकारी माना जाता है।
उपाय हमेशा कुंडली की वास्तविक स्थिति देखकर करना चाहिए।
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🔮 प्रश्नकुंडली के अनुसार :
जब किसी व्यक्ति के मन में कोई विशेष प्रश्न हो —
जैसे नौकरी मिलेगी या नहीं, व्यापार सफल होगा या नहीं, विवाह में बाधा क्यों है, रुका हुआ धन कब मिलेगा, कोई कार्य सफल होगा या नहीं —
तब प्रश्न पूछे जाने के समय की प्रश्नकुंडली का विचार किया जाता है।
यदि प्रश्नकुंडली में लग्नेश, पंचमेश, नवमेश, दशमेश अथवा लाभ भाव के स्वामी शुभ स्थिति में हों और गणेश तत्त्व से संबंधित ग्रह बुध की स्थिति मजबूत हो, तो कार्यसिद्धि की संभावना को शुभ संकेतों के रूप में देखा जा सकता है।
चतुर्थी के दिन यदि कोई महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभ करने का विचार हो, तो केवल तिथि देखकर निर्णय न लेकर पूर्ण पंचांग, मुहूर्त और व्यक्ति की जन्मकुंडली का विचार करना अधिक उचित है।
ये भी रहेगा विशेष :
माघ मास में शुक्ल पक्ष की गुप्त नवरात्रि चल रही है।
वर्तमान समय गुप्त नवरात्रि के साथ वरद तिल कुंड चतुर्थी का योग बनने से एक अद्भुत संयोग उत्पन्न हुआ है।
इस दौरान गुप्त साधक श्री गणेश के मंत्रों के साथ - साथ आदि शक्ति के मंत्रों से संपुटिक अनुष्ठान करते हैं।
अर्थात एक मंत्र भगवान श्री गणेश का उच्चारण किया जाता है।
इसके बाद एक मंत्र माता जी का पढ़ा जाता है।
इस प्रकार संपूटिक अनुष्ठान संपन्न होता है।
गोचर के ग्रहों के अनुसार तिलकुंद चतुर्थी :
गोचर में बुध, गुरु, शुक्र, सूर्य, चंद्र और शनि की स्थिति व्यक्ति के जीवन के अलग - अलग क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली मानी जाती है।
यदि गोचर में शुभ ग्रह केंद्र या त्रिकोण भावों को प्रभावित कर रहे हों, दशा भी अनुकूल हो और जन्मकुंडली में संबंधित भाव मजबूत हो, तो तिलकुंद चतुर्थी का दिन शुभ संकल्प, पूजा, शिक्षा, व्यापारिक योजना और महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कार्यों के लिए उपयोगी हो सकता है।
लेकिन यदि गोचर में अष्टम, द्वादश या षष्ठ भाव से संबंधित कठिन ग्रह प्रभाव चल रहे हों, तो इस दिन विशेष रूप से विघ्ननाशक गणेश साधना करना मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से उपयोगी माना जा सकता है।
इस लिए केवल “आज कौन - सी राशि को लाभ होगा” कहना पर्याप्त ज्योतिष नहीं है।
वास्तविक फल के लिए जन्मकुंडली + दशा + गोचर + प्रश्नकुंडली, इन सभी का समन्वय अधिक महत्वपूर्ण है।
🪔 तिलकुंद चतुर्थी के व्रत के नियम
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त अथवा अपनी सुविधा के अनुसार जल्दी उठकर स्नान करें।
स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन में भगवान श्रीगणेश का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें।
पूजा स्थान को स्वच्छ करके भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
फिर—
🌺 गणेशजी को जल या पंचामृत से स्नान कराएं।
🌺 सिंदूर और अक्षत अर्पित करें।
🌺 लाल अथवा पीले पुष्प अर्पित करें।
🌺 दूर्वा अर्पित करें।
🌺 तिल-गुड़ अथवा तिल के लड्डू का भोग लगाएं।
🌺 धूप और दीप प्रज्वलित करें।
🌺 गणेश मंत्र का जाप करें।
🌺 गणेश चतुर्थी की कथा या गणेश माहात्म्य का श्रवण करें।
🌺 अंत में आरती करके क्षमा प्रार्थना करें।
व्रत की कठोरता व्यक्ति की क्षमता, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखी जानी चाहिए।
अस्वस्थ व्यक्ति को बिना आवश्यकता कठोर उपवास नहीं करना चाहिए।
वरद तिल चतुर्थी की पूजा विधि :
वरद तिल चतुर्थी गणेश जी की पूजा को समर्पित है।
वरद तिल चतुर्थी की पूजा ब्रह्म मुहूर्त और गोधूलि मुहूर्त में की जाती है।
वरद तिल चतुर्थी के दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर साफ - स्वच्छ वस्त्र पहनें।
इसके बाद आसन पर बैठकर भगवान श्रीगणेश का पूजन करें।
पूजा के दौरान भगवान श्रीगणेश को धूप - दीप दिखाएं।
अब श्री गणेश को फल, फूल, चावल, रौली, मौली चढ़ाएं।
पंचामृत से स्नान कराने के बाद तिल अथवा तिल - गुड़ से बनी वस्तुओं व लड्डुओं का भोग लगाएं।
जब श्रीगणेश की पूजा करें तो अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
पूजा के बाद 'ॐ श्रीगणेशाय नम:' का जाप 108 बार करें।
शाम के समय कथा सुनें व भगवान की आरती उतारें।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन गर्म कपड़े, कंबल, कपड़े व तिल आदि का दान करें।
📿 मुख्य गणेश मंत्र :
ॐ गं गणपतये नमः।
इस सरल मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है।
पूजा के समय प्रसिद्ध प्रार्थना—
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभकार्येषु सर्वदा॥
का पाठ भी किया जाता है।
गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करने की भी गणेश उपासना में विशेष परंपरा है।
कुछ परंपराओं में इस दिन 21 आवर्तन करने की विधि भी बताई जाती है, लेकिन यह अनिवार्य नियम नहीं समझना चाहिए।
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🌸उपाय :
1. कार्यों में बार - बार बाधा हो
भगवान गणेश को दूर्वा और सिंदूर अर्पित करके “ॐ गं गणपतये नमः” का जाप करें।
2. व्यापार में रुकावट हो
गणेशजी को तिल - गुड़ का नैवेद्य लगाकर जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या तिल-गुड़ का दान करें।
3. पढ़ाई में मन न लगे
विद्यार्थी गणेशजी के सामने बैठकर मंत्र जाप करें और अध्ययन प्रारंभ करने से पहले गणेश स्मरण करें।
4. विवाह संबंधी बाधा हो
कुंडली में विवाह भाव, शुक्र, गुरु और सप्तम भाव की वास्तविक स्थिति देखकर उपाय निर्धारित करना चाहिए।
सामान्य रूप से गणेश पूजन के साथ गौरी - शंकर की आराधना की जा सकती है।
5. धन की समस्या हो
गणेश पूजन के साथ लक्ष्मी का स्मरण करें, लेकिन केवल धन प्राप्ति की इच्छा न रखते हुए सद्बुद्धि, सही निर्णय और उचित कर्म की प्रार्थना करें।
6. शनि संबंधी बाधा हो
तिल का दान, गरीब या जरूरतमंद को भोजन तथा गणेश मंत्र का जाप किया जा सकता है।
यदि शनि वास्तव में जन्मकुंडली में पीड़ित हो तो शनि के लिए अलग उपाय कुंडली देखकर करना चाहिए।
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🌿 तिल का आध्यात्मिक संदेश :
तिलकुंद चतुर्थी में तिल का प्रयोग केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश भी देता है।
छोटा - सा तिल अनेक दानों में मिलकर बड़ा परिणाम देता है।
उसी प्रकार मनुष्य का छोटा-सा शुभ कर्म, जब लगातार श्रद्धा और अनुशासन से किया जाता है, तो जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।
इस लिए इस दिन केवल पूजा करके अगले दिन पुराने गलत व्यवहार में लौटना इस पर्व की वास्तविक भावना नहीं है।
गणेशजी की पूजा का अर्थ है —
अज्ञान से ज्ञान की ओर, अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर और बाधा से समाधान की ओर बढ़ना।
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📖 एक प्रेरणादायक कथा :
एक नगर में एक विद्वान व्यक्ति रहता था।
उसकी बुद्धि अच्छी थी, लेकिन उसके हर काम में किसी न किसी प्रकार की बाधा आती थी।
व्यापार शुरू करता तो समस्या आती, नया कार्य करता तो विलंब होता और कोई निर्णय लेता तो मन में संदेह उत्पन्न हो जाता।
एक दिन वह एक ज्योतिषविद् के पास गया।
ज्योतिषी ने उसकी जन्मकुंडली देखकर कहा—
“तुम्हारे जीवन में केवल ग्रहों को दोष देने से समस्या हल नहीं होगी।
तुम्हें अपनी बुद्धि, निर्णय और कर्म को भी व्यवस्थित करना होगा।
माघ शुक्ल चतुर्थी को भगवान श्रीगणेश की आराधना करो और उस दिन एक संकल्प लो कि किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पहले जल्दबाजी नहीं करोगे।”
व्यक्ति ने तिलकुंद चतुर्थी का व्रत रखा।
गणेशजी को दूर्वा, सिंदूर और तिल - गुड़ अर्पित किया।
उसने प्रार्थना की—
“हे गणपति! मुझे केवल सफलता नहीं चाहिए।
मुझे सही और गलत में अंतर करने की बुद्धि दीजिए।”
उस दिन से उसने अपना व्यवहार बदलना शुरू किया।
जहाँ पहले वह बिना सोचे निर्णय लेता था, अब विचार करने लगा।
जहाँ पहले क्रोध में उत्तर देता था, अब शांत रहने लगा।
जहाँ पहले गलत लोगों पर विश्वास करता था, अब सावधानी रखने लगा।
कुछ समय बाद उसके कार्यों में सुधार दिखाई देने लगा।
तब उसे समझ आया कि गणेशजी ने उसके जीवन की समस्याएँ जादू से नहीं हटाईं; उन्होंने उसके भीतर समस्या का सही समाधान देखने की बुद्धि जगाई।
यही वरद चतुर्थी का सबसे सुंदर संदेश है—
सबसे बड़ा वरदान केवल धन नहीं, बल्कि सद्बुद्धि है।
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🙏🏻 संदेश :
तिलकुंद चतुर्थी के दिन भगवान श्रीगणेश से केवल अपनी इच्छा पूर्ण करने की प्रार्थना न करें, बल्कि यह भी कहें—
“हे विघ्नहर्ता! मेरे जीवन से अज्ञान, अहंकार, आलस्य, गलत निर्णय और अनुचित कर्मों के विघ्न दूर कीजिए।
मुझे सद्बुद्धि, विवेक, संयम, सही मार्ग और अपने कर्मों को पूर्ण करने की शक्ति प्रदान कीजिए।”
जन्मकुंडली में ग्रह चाहे जैसे हों, मनुष्य के लिए श्रद्धा, सदाचार, सत्कर्म और उचित प्रयास सदैव महत्वपूर्ण हैं।
इस लिए तिलकुंद चतुर्थी पर—
गणेश पूजन करें।
तिल-गुड़ का भोग लगाएं।
दूर्वा अर्पित करें।
गणेश मंत्र का जाप करें।
जरूरतमंद को दान दें।
माता - पिता एवं गुरुजनों का सम्मान करें।
और अपने जीवन में एक बुरी आदत छोड़ने तथा एक अच्छी आदत अपनाने का संकल्प लें।
यही इस पवित्र तिथि की साधना को जीवन से जोड़ने का श्रेष्ठ मार्ग है।
पंडारामा प्रभु राज्यगुरू ( द्रविड़ ब्राह्मण )
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!!!!! शुभमस्तु !!!
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