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Wednesday, January 29, 2025

जानिए ग्रहों की दशा से भी परे सबसे महत्वपूर्ण चीज क्या है? / नाराज हो जाते हैं पितर :

जानिए ग्रहों की दशा से भी परे सबसे महत्वपूर्ण चीज क्या है...? / नाराज हो जाते हैं पितर...!

जानिए ग्रहों की दशा से भी परे सबसे महत्वपूर्ण चीज क्या है...?

प्रयागराज में महाकुंभ का शुभारंभ 13 जनवरी से हो चुका है, और यह 26 फरवरी 2025 तक चलेगा।

प्रयागराज में महाकुंभ का शुभारंभ 13 जनवरी से हो चुका है, और यह 26 फरवरी 2025 तक चलेगा। 

संगम नगरी में लगे इसे महाकुंभ में देश दुनिया से लाखों की संख्या में श्रद्धालु, साधु-संत और पर्यटक पवित्र डुबकी लगाने आ रहे हैं। 

मान्यता है कि महाकुंभ के इस भव्य आयोजन में डुबकी लगाने से न केवल पापों का नाश होता है, बल्कि जीवन में सकारात्मकता और शांति का आगमन भी होता है। 

इसी बीच 25 जनवरी 2025 यानी की आज महाकुंभ नगर में अमर उजाला और उससे जुड़े उपक्रम जीवांजलि और माय ज्योतिष की ओर से 'अमर उजाला ज्योतिष महाकुंभ महोत्सव' का आयोजन किया जा रहा है जहां कई ज्योतिषाचार्य शामिल होने के लिए आएं है, यहां सभी ज्योतिष शास्त्र के अद्भुत विज्ञान और इसकी गहराई पर अपनी राय रख रहे हैं, 








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इस दौरान ज्योतिषाचार्य प्रभु ने अपनी बात रखते हुए लाल किताब के रहस्यमय संसार के बारे में जिक्र किया....!

लाल किताब क्या है....?


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लाल किताब ज्योतिष की प्रमुख शाखा है, जो भारतीय ज्योतिष पर आधारित है। 

माना जाता है कि इस लाल किताब में कुंडली दोष और जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए कई उपाय बताए गए हैं। 

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फॉर्मूला आधारित है ज्योतिष :


लाल किताब विशेषज्ञ पंडारामा ज्योतिषाचार्य प्रभु राज्यगुरु ने कहा कि इस समय आकाश में ग्रहों की स्थिति इस प्रकार है कि महाकुंभ की धरती पर जो पानी है, वह अमृततुल्य है। 

यहां त्रिवेणी है। 

जब इंसान ग्रहों की अलग - अलग स्थिति में जन्म लेता है, तो इससे उसकी सोच दूसरों से अलग हो जाती है। 

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए पंडारामा ज्योतिषाचार्य प्रभु राज्यगुरु ने कहा कि आजकल ज्योतिष विज्ञान में कई लोग यह गलती कर देते हैं कि वे एक घर के अंदर बैठे ग्रह के फल को पढ़ देते हैं। 

ज्योतिष असल में एक विज्ञान है एक गणित है जो भी इसके फॉर्मूले समझ जाएगा, वह ज्योतिष विज्ञान समझ पाएगा।

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संस्कार की परिभाषा का किया जिक्र :


ऋषि-मुनियों ने ग्रहों की दिशा से अलग हमें एक महत्वपूर्ण चीज बताई, जिसका नाम है संस्कार।

पंडारामा ज्योतिषाचार्य प्रभु राज्यगुरु ने कहा कि जब तक हम किसी चीज की गहराई में नहीं उतर जाते है तब तक उसके बारे में पूरा ज्ञान नहीं मिल पाता। 

आजकल लोग व्यसनों से जूझ रहे हैं और बच्चे बिगड़ रहे हैं। 

ऐसा ना हो इस लिए ही संस्कार बनाए गए थे।

जिनके ग्रह खराब हैं, उनके आचार-विचार को भी नियंत्रण में रखा जाए, इसी के लिए संस्कार बने थे। 

दुनिया में बड़ी सोच वाले लोग सिर्फ 20 फीसदी है, उनमें भी श्रेष्ठ विचार रखने वालों की संख्या एक-दो फीसदी ही है। 

दुनिया में आज नासमझों की भीड़ बहुत ज्यादा है।

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नाराज हो जाते हैं पितर मौनी अमावस्‍या के दिन भूलकर भी न करें ये काम, लगता है पाप....!


माघ मास की अमावस्‍या को मौनी अमावस्‍या कहते हैं। 


इस दिन पवित्र नदियों में स्‍नान करने और दान पुण्‍य के कार्य करने का विशेष महत्‍व होता है। 


इस साल मौनी अमावस्‍या पर श्रद्धालुओं को कुंभ स्‍नान का परम पुण्‍य प्राप्‍त होगा। 


मौनी अमावस्‍या पर मौन व्रत रखने के साथ ही कुछ खास नियमों का पालन करना भी अनिवार्य माना जाता है। 


आइए आपको बताते हैं कि मौनी अमावस्‍या पर कौन सी गलतियां भूलकर भी नहीं करनी चाहिए।


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मौनी अमावस्‍या है और इस बार मौनी अमावस्‍या पर महाकुंभ का अद्भुत संयोग बना है। 

इस दिन गंगा स्‍नान और दान पुण्‍य जैसे धार्मिक कार्य करने का विशेष महत्‍व होता है। 

मौनी अमावस्‍या पर व्रत करने और पितरों का तर्पण करने से उनकी आत्‍मा को शांति मिलती है और उनके आशीर्वाद से आपको जीवन में तरक्‍की प्राप्‍त होती है। 

इस बार तो लोगों को मौनी अमावस्‍या पर कुंभ स्‍नान करने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हो रहा है। 

मौनी अमावस्‍या पर मौन व्रत रखने का महत्‍व शास्‍त्रों में बहुत खास माना गया है। 

साथ ही इस दिन कुछ विशेष नियमों का पालन भी किया जाता है। 

तो आइए आपको बताते हैं कि मौनी अमावस्‍या के नियम और किन बातों का रखें विशेष ध्‍यान।

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मौनी अमावस्‍या पर क्‍या करें :

मौनी अमावस्‍या पर बिना अन्‍न जल ग्रहण किए अनाज का दान करें।

मौनी अमावस्‍या पर ब्राह्मणों को भोजन करवाने का खास महत्‍व होता है। 

अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तो कम से कम एक व्‍यक्ति के खाने की मात्रा के अनुसार काली उड़द और चावल दान करें। 

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साथ ही तिल और गरम वस्‍त्रों का भी दान करें। 

साथ ही उसमें कुछ सामर्थ्य के अनुसार धन राशि भी दान करें। 

ऐसा करने से आपकी ग्रह दशा में सुधार होता है और आपको पितरों की कृपा प्राप्‍त होती है।

मौनी अमावस्या पर गाय, कुत्ते और कौवे जैसे जानवरों को खाना खिलाने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है। 

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इस दिन ऐसा करने से पितृ खुश होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। 

मान्यता है कि ऐसा करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।

मौनी अमावस्‍या पर घर में सत्‍य नारायण भगवान की कथा करवाने से घर में नकारात्‍मक शक्तियों का अंत होता है और आपके परिवार में सुख शांति बढ़ती है।

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मौनी अमावस्‍या पर सुबह के वक्‍त पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं और शाम में सरसों के तेल का दीपक भी जलाएं। 

साथ ही इस‍ दिन नदी में दीपक प्रवाहित करना भी शुभ माना जाता है। 

इसके साथ ही घर में लगी पूर्वजों की तस्‍वीर के पास भी दीपक जलाना चाहिए!

अमावस्‍या तिथि पितरों को समर्पित होती है इस लिए दक्षिण दिशा में शाम के वक्‍त सरसों के तेल का दीपक जरूर जलाएं और साथ ही मुख्‍य द्वार पर दोनों तरफ 2 दीपक भी जलाकर रखें।

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मौनी अमावस्‍या पर क्‍या न करें : 

मौनी अमावस्या पर लोग अपने पितरों को याद करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं। 

इस दिन कुछ तामसिक भोजन जैसे मांस, मछली और शराब का सेवन नहीं करना चाहिए। 

ऐसा माना जाता है कि इससे पितरों को कष्ट होता है।

पितरों की आत्मा की शांति के लिए उन्हें याद करते समय कुछ भी नकारात्मक नहीं बोलना चाहिए। 

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कुत्ता, गाय और कौवे जैसे जानवरों को भी परेशान नहीं करना चाहिए।

पितरों के लिए पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य करना बहुत महत्वपूर्ण है। 

ऐसा करने से पितरों को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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साफ - सफ़ाई का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। 

घर के आस - पास गंदगी नहीं फैलानी चाहिए। 

इस दिन स्वच्छता का महत्व है। 

यह माना जाता है कि स्वच्छ वातावरण सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।






चन्द्रमा का प्रभाव, महत्त्व, फल तथा उपाय :

ऋग्वेद में कहा गया है कि ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत:।‘ 

अर्थात चंद्रमा जातक के मन का स्वामी होता है। 

मन का स्वा मी होने के कारण यदि जन्म कुंडली में चंद्रमा की स्थिति ठीक न हो या वह दोषपूर्ण स्थिति में हो तो जातक को मनऔर मस्तिष्क से संबंधी परेशानियां होती हैं। 

चन्द्रमा मां का सूचक है और मन का कारक है। इसकी राशि कर्क होती हैं।

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प्रत्येक जन्मपत्री में दो लग्न बनाये जाते हैं। 

एक जन्म लग्न और दूसरा चन्द्र लग्न। 

जन्म लग्न को देह समझा जाये तो चन्द्र लग्न मन है। 

बिना मन के देह का कोई अस्तित्व नहीं होता और बिना देह के मन का कोई स्थान नहीं  है। 

देह और मन हर प्राणी के लिए आवश्यक है इसी लिये लग्न और चन्द्र दोनों की स्थिति देखना ज्योतिष शास्त्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। 

सूर्य लग्न का अपना महत्व है। 

वह आत्मा की स्थिति को दर्शाता है। 

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मन और देह दोनों का विनाश हो जाता है परन्तु आत्मा अमर है।

चन्द्र ग्रहों में सबसे छोटा ग्रह है। 

परन्तु इसकी गति ग्रहों में सबसे अधिक है। 

शनि एक राशि को पार करने के लिए ढ़ाई वर्ष लेता है, बृहस्पति लगभग 13 माह, राहू लगभग 18 महीने और चन्द्रमा सवा दो दिन कितना अंतर है। 

चन्द्रमा की तीव्र गति और इसके प्रभावशाली होने के कारण किस समय क्या घटना होगी, चन्द्र से ही पता चलता है।  

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विंशोत्तरी दशा, योगिनी दशा, अष्टोतरी दशा आदि यह सभी दशाएं चन्द्र की गति से ही बनती है।  

चन्द्र जिस नक्षत्र के स्वामी से ही दशा का आरम्भ होता है। 

अश्विनी नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक की दशा केतु से आरम्भ होती है क्योंकि अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु है। 

इस प्रकार जब चन्द्र भरणी नक्षत्र में हो तो व्यक्ति शुक्र दशा से अपना जीवन आरम्भ करता है क्योंकि भरणी नक्षत्र का स्वामी शुक्र है। 

अशुभ और शुभ समय को देखने के लिए दशा, अन्तर्दशा और प्रत्यंतर दशा देखी जाती है। 

यह सब चन्द्र से ही निकाली जाती है। 

ग्रहों की स्थिति  निरंतर हर समय बदलती  रहती है। 

ग्रहों की बदलती स्थिति का प्रभाव विशेषकर चन्द्र कुंडली से ही देखा जाता है। 

जैसे शनि चलत में चन्द्र से तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में हो तो शुभ फल देता है और दुसरे भावों में हानिकारक होता है। 

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बृहस्पति चलत में चन्द्र लग्न से दूसरे, पाँचवे, सातवें, नौवें और ग्यारहवें भाव में शुभ फल देता है और दूसरे भावों में इसका फल शुभ नहीं होता। 

इसी प्रकार सब ग्रहों का चलत में शुभ या अशुभ फल देखना के लिए चन्द्र लग्न ही देखा जाता है। 

कई योग ऐसे होते हैं तो चन्द्र की स्थिति से बनते हैं और उनका फल बहुत प्रभावित होता है।

चन्द्र से अगर शुभ ग्रह छः, सात और आठ राशि में हो तो यह एक बहुत ही शुभ स्थिति है। 

शुभ ग्रह शुक्र, बुध और बृहस्पति माने जाते हैं। 

यह योग मनुष्य जीवन सुखी, ऐश्वर्या वस्तुओं से भरपूर, शत्रुओं पर विजयी , स्वास्थ्य, लम्बी आयु कई प्रकार से सुखी बनाता है। 

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जब चन्द्र से कोई भी शुभ ग्रह जैसे शुक्र, बृहस्पति और बुध दसवें भाव में हो तो व्यक्ति दीर्घायु, धनवान और परिवार सहित हर प्रकार से सुखी होता है।

चन्द्र  से कोई भी ग्रह जब दूसरे या बारहवें भाव में न हो तो वह अशुभ होता है। 

अगर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि चन्द्र पर न हो तो वह बहुत ही अशुभ होता है। 

इस प्रकार से चन्द्र की स्थिति से 108 योग बनते हैं और वह चन्द्र लग्न से ही बहुत ही आसानी के साथ देखे जा सकते हैं।

चन्द्र का प्रभाव पृथ्वी, उस पर रहने वाले प्राणियों और पृथ्वी के दूसरे पदार्थों पर बहुत ही प्रभावशाली होता है। 

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चन्द्र के कारण ही समुद्र मैं ज्वारभाटा उत्पन्न होता है। 

समुद्र पर पूर्णिमा और अमावस्या को 24 घंटे में एक बार चन्द्र का प्रभाव देखने को मिलता है। 

किस प्रकार से चन्द्र सागर के पानी को ऊपर ले जाता है और फिर नीचे ले आता है।  

तिथि बदलने के साथ-साथ सागर का उतार चढ़ाव भी बदलता  रहता है। 

प्रत्येक व्यक्ति में 60 प्रतिशत से अधिक पानी होता है। 

इस से अंदाज़ा लगाया जा सकता है चन्द्र के बदलने का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता होगा।  

चन्द्र के बदलने के साथ - साथ किसी पागल व्यक्ति की स्थिति को देख कर इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

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चन्द्र साँस की नाड़ी और शरीर में खून का कारक है। 

चन्द्र की अशुभ स्थिति से व्यक्ति को दमा भी हो सकता है।  

दमे के लिए वास्तव में वायु की तीनों राशियाँ मिथुन, तुला और कुम्भ इन पर अशुभ ग्रहों की दृष्टि, राहु और केतु का चन्द्र संपर्क, बुध और चन्द्र की स्थिति यह सब देखने के पश्चात ही निर्णय लिया जा सकता है।

चन्द्र माता का कारक है। 

चन्द्र और सूर्य दोनों राजयोग के कारक होते हैं। 

इन की स्थिति शुभ होने से अच्छे पद की प्राप्ति होती है। 

चन्द्र जब धनी बनाने पर आये तो इसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता।

चन्द्र खाने - पीने के विषय में बहुत प्रभावशाली है। 

अगर चन्द्र की स्थिति ख़राब हो जाये  तो व्यक्ति कई नशीली वस्तुओं का सेवन करने लगता है। 

जातक पारिजात के आठवें अध्याय के 100 वे श्लोक में लिखा है चन्द्र उच्च का वृष राशि का हो तो व व्यक्ति मीठे पदार्थ खाने का इच्छुक होता है।  

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जातक पारिजात के अध्याय 6, श्लोक 81 में  लिखा है कि चन्द्र खाने-पीने की आदतों पर प्रभाव डालता है।  

इसी प्रकार बृहत् पराशर होरा के अध्याय 57 श्लोक 48 में लिखा है कि अगर चन्द्र की स्थिति निर्बल हो तो शनि की अंतरदशा में व्यक्ति को समय से खाना नहीं मिलता।

किसी भी कुंडली में चंद्र अशुभ होने पर माता को किसी भी प्रकार का कष्ट या स्वास्थ्य को खतरा होता है, दूध देने वाले पशु की मृत्यु हो जाती है। 

स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है. घर में पानी की कमी आ जाती है या नलकूप, कुएं आदि सूख जाते हैं। 

इस के प्रभाव से मानसिक तनाव, मन में घबराहट, मन में तरह तरह की शंका और सर्दी बनी रहती है. व्यक्ति के मन में आत्महत्या करने के विचार भी बार - बार आते रहते हैं।

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अगर मन अच्छा है, मनोबल ऊँचा है तब व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास भी बढ़ता है और वह विपरीत परिस्थितियो में भी डटा रहता है लेकिन यदि किसी व्यक्ति का मन कमजोर है या वह बहुत जल्दी परेशान हो जाता है इस का अर्थ है कि कुण्डली में उसका चंद्रमा कमजोर अवस्था में है। 

आज हम कमजोर चंद्रमा की बात करेगें. चंद्रमा जब कुंडली के 6, 8 या 12वें भाव में अकेला स्थित होता है तब कमजोर हो जाता है. व्यक्ति का मन हमेशा अशांत रहता है। 

ग्रहों में चंद्रमा को स्त्री स्वरूप माना गया है। 

भगवान शिव ने चंद्रमा को मस्तक पर धारण किया हुआ है, इस लिए भगवान शिव को चंद्रमा का देवता कहा गया है। 

जिस प्रकार सूर्य हमारे व्यक्तित्व को आकर्षक बनाते हैं, उसी प्रकार चंद्रमा हमारे मन को मजबूत करते हैं। 

चंद्रमा हमारे मन का कारक है। 

चंद्रमा हमारी माता का भी कारक है। 

जिनकी कुंडली में चंद्रमा उच्च का होता है, उनको अपनी मां का भरपूर प्यार मिलता है। 

जिनकी कुंडली में चंद्रमा दूर होता है, उनको मां का प्यार उतना नहीं मिल पाता। 

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जिसकी कुंडली में चंद्रमा अच्छा होता है, उसको बलवान कुंडली माना जाता है। 

चंद्रमा की उच्च स्थिति मन में सकारात्मक विचारों का प्रवाह करती है। 

ऐसे जातक जो भी कार्य करने की ठान लेते हैं, उसको सफलतापूर्वक सम्पादित करके ही दम लेते हैं। 

जिनकी कुंडली का स्वामी चंद्र होता है, उनकी कल्पनाशक्ति गजब की होती है।

जिस प्रकार सूर्य का प्रभाव आत्मा पर पूरा पड़ता है, ठीक उसी प्रकार चन्द्रमा का भी मनुष्य पर प्रभाव पड़ता है. खगोलवेत्ता ज्योतिष काल से यह मानते आ रहे हैं कि ग्रह तथा उपग्रह मानव जीवन पर पल - पल पर प्रभाव डालते हैं. जगत की भौतिक परिस्थिति पर भी चंद्रमा का प्रभाव होता है।

चंद्रमा का घटता बढ़ता आकार जिस प्रकार पृथ्‍वी पर समुद्र में ज्वार भाटा का कारक बनता है उसी प्रकार इसका प्रभाव मनुष्‍य के तन और मन पर भी पड़ता है। 

चन्द्रमा जैसे - जैसे कृष्ण पक्ष में छोटा व शुक्ल पक्ष में पूर्ण होता है वैसे - वैसे मनुष्य के मन पर भी चन्द्र का प्रभाव पड़ता है। 

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सूर्य के बाद धरती के उपग्रह चन्द्र का प्रभाव धरती पर पूर्णिमा के दिन सबसे ज्यादा रहता है। 

जिस तरह मंगल के प्रभाव से समुद्र में मूंगे की पहाड़ियां बन जाती हैं और लोगों का खून दौड़ने लगता है उसी तरह चन्द्र से समुद्र में ज्वार - भाटा उत्पत्न होने लगता है। 

जितने भी दूध वाले वृक्ष हैं सभी चन्द्र के कारण उत्पन्न हैं। 

चन्द्रमा बीज, औषधि, जल, मोती, दूध, अश्व और मन पर राज करता है। 

लोगों की बेचैनी और शांति का कारण भी चन्द्रमा है। 

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चंद्रमा के प्रभाव आपकी कुंडली मे :

कुंडली में चंद्रमा की स्थिति और उस पर दूसरे ग्रहों के प्रभावों के आधार पर इस बात की गणना करना बहुत आसान हो जाता है कि मनुष्य की मानसिक स्थिति कैसी रहेगी। 

अपने ज्योेतिषीय अनुभव में कई बार यह देखा है कि कुंडली में चंद्र का उच्च या नीच होना व्यक्ति के स्वा्भाव और स्वपरूप में साफ दिखाई देता है।

कुछ जन्म कुंडलियां  जिनमें चंद्रमा के पीडित या नीच होने पर जातक को कई परेशानियां हो रही थीं-

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1. सिर दर्द व मस्तिष्क पीडा  जन्म कुंडली में अगर  चंद्र 11, 12, 1,2 भाव में नीच का होऔर पाप प्रभाव में हो, या सूर्य अथवा राहु के साथ हो तो मस्तिष्क पीडा रहती हैं । 

इस  जातक  को 28  वे वर्ष में मस्तिष्क पीडा शुरु हुई थी, जो कि 7 साल तक रही । 

इस दौरान जातक ने अनेक उपाय करवाये ।

2. डिप्रेशन या तनाव : चंद्र जन्म कुंडली में 6, 8, 12 स्थान में शनि के साथ हो । 

शनि का प्रभाव दीर्घ अवधी तक फल देने वाला माना जाता हैं, तथा चंद्र और शनि का मिलन उस घातक विष के समान प्रभाव रखने वाला होता हैं जो धीरे धीरे करके मारता हैं। 

शनि नशो ( Puls ) का कारक होता हैं....! 

इन दोनो ग्रहो का अशुभ स्थान पर मिलन परिणाम डिप्रेशन व तनाव उतपन्न करता हैं ।

3. भय व घबराहट ( Phobia ) : चंद्र व चतुर्थ भाव का मालिक अष्टम स्थान में हो...! 

लग्नेश निर्बल हो तथा चतुर्थ स्थान में मंगल,केतु, व्ययेश, तृतियेश तथा अष्टमेश में से किन्ही दो ग्रह या ज्यादा का प्रभाव चतुर्थ स्थान में हो तो इस भयानक दोष का प्रभाव व्यक्ति को दंश की तरह चुभता रहता हैं। 

चतुर्थ स्थान हमारी आत्मा या चित का प्रतिनिधित्व करता हैं....! 

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ऐसे में इस स्थान के पाप प्रभाव में होने पर उसका प्रभाव सीधे सीधे हमारे मन व आत्मा पर पडता हैं ।

4. मिर्गी के दौरे : चंद्र राहु या केतु के साथ हो तथा लग्न में कोई वक्री ग्रह स्थित हो तो मिर्गी के दौरे पडते हैं।

5- पागलपन या बेहोशी- चतुर्थ भाव का मालिक  तथा लग्नेश पीडित हो या पापी ग्रहो के प्रभाव में हो,  चंद्रमा सूर्य के निकट हो तो पागलपन या मुर्छा के योग बनते हैं। 

इस योग में मन  व बुद्धि को नियंत्रित करने वाले सभी कारक पीडित होते हैं । 

चंद्र, लग्न, व चतुर्थेश इन पर पापी प्रभाव का अर्थ हैं व्यक्ति को मानसिक रोग होना। 

लग्न को सबसे शुभ स्थान माना गया हैं परन्तु इस स्थान में किसी ग्रह के पाप प्रभाव में होने से उस ग्रह के कारक में हानी दोगुणे प्रभाव से होती हैं ।

6. आत्महत्या के प्रयास : अष्टमेश व लग्नेश वक्री या पाप प्रभाव में हो तथा चंद्र के तृतिय स्थान में होने से व्यक्ति बार बार अपने को हानि पहुंचाने की कोशिश करता हैं । 

या फिर तृतियेश व लग्नेश शत्रु ग्रह हो, अष्टम स्थान में चंद अष्टथमेश के साथ होतो जन्म कुंडली में आत्म हत्या के योग बनते हैं । 

कुछ ऐसे ही योग हिटलर की पत्रिका में भी थे जिनकी वजह से उसने आत्मदाह किया।

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कुंडली के बारह भावों में चंद्रमा का फल :

1 : पहले लग्न में चंद्रमा हो तो जातक बलवान, ऐश्वर्यशाली, सुखी, व्यवसायी, गायन वाद्य प्रिय एवं स्थूल शरीर का होता है...!  

2 : दूसरे भाव में चंद्रमा हो तो जातक मधुरभाषी, सुंदर, भोगी, परदेशवासी, सहनशील एवं शांति प्रिय होता है....! 

3 : तीसरे भाव में अगर चंद्रमा हो तो जातक पराक्रम से धन प्राप्ति, धार्मिक, यशस्वी, प्रसन्न, आस्तिक एवं मधुरभाषी होता है.

4 : चौथे भाव में हो तो जातक दानी, मानी, सुखी, उदार, रोगरहित, विवाह के पश्चात कन्या संततिवान, सदाचारी, सट्टे से धन कमाने वाला एवं क्षमाशील होता है.  

5 : लग्न के पांचवें भाव में चंद्र हो तो जातक शुद्ध बुद्धि, चंचल, सदाचारी, क्षमावान तथा शौकीन होता है. 

6 : लग्न के छठे भाव में चंद्रमा होने से जातक कफ रोगी, नेत्र रोगी, अल्पायु, आसक्त, व्ययी होता है. 

7 : चंद्रमा सातवें स्थान में होने से जातक सभ्य, धैर्यवान, नेता, विचारक, प्रवासी, जलयात्रा करने वाला, अभिमानी, व्यापारी, वकील एवं स्फूर्तिवान होता है. 

8 : आठवें भाव में चंद्रमा होने से जातक विकारग्रस्त, कामी, व्यापार से लाभ वाला, वाचाल, स्वाभिमानी, बंधन से दुखी होने वाला एवं ईर्ष्यालु होता है. 

9 : नौंवे भाव में चंद्रमा होने से जातक संतति, संपत्तिवान, धर्मात्मा, कार्यशील, प्रवास प्रिय, न्यायी, विद्वान एवं साहसी होता है. 

10 :  दसवें भाव में चंद्रमा होने से जातक कार्यकुशल, दयालु, निर्मल बुद्धि, व्यापारी, यशस्वी, संतोषी एवं लोकहितैषी होता है.

11 : लग्न के ग्यारहवें भाव में चंद्रमा होने से जातक चंचल बुद्धि, गुणी, संतति एवं संपत्ति से युक्त, यशस्वी, दीर्घायु, परदेशप्रिय एवं राज्यकार्य में दक्ष होता है. 

12 : लग्न के बारहवें भाव में चंद्रमा होने से जातक नेत्र रोगी, कफ रोगी, क्रोधी, एकांत प्रिय, चिंतनशील, मृदुभाषी एवं अधिक व्यय करने वाला होता है.  

ज्योतिषाचार्य पंडारामा प्रभु राज्यगुरु 
ऑन लाइन/ ऑफ लाइन ज्योतिषी 
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!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,
" Shri Aalbai Niwas "
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
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Tuesday, January 28, 2025

श्री वैदिक ज्योतिष शास्त्र अनुसार मौनी अमावस्या महात्म ।

श्री वैदिक ज्योतिष शास्त्र अनुसार मौनी अमावस्या महात्म ।

|| मौनी अमावस्या व्रत कथा ||

मौनी अमावस्या की कथा को लेकर जो प्रचलित कथा है उसके अनुसार, प्राचीन काल में एक ब्राह्मण परिवार कांचीपुरी में रहता था। 

पति पत्नी दोनों ही धर्मात्मा थे और धर्म पूर्वक अपनी गृहस्थी चलाते थे। 

इनका नाम देवस्वामी था और इनकी पत्नी का नाम धनवती था। 



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इन के सात सात पुत्र और एकमात्र पुत्री थी जिसका नाम गुणवती था। 

जब गणुवती सयानी हुई और तो देवस्वामी से धनवती ने कहा कि पुत्री के विवाह के लिए अब वर देखना चाहिए। 

ब्रह्मण ने अपने छोटे पुत्र को बहन गुणवती की कुंडली दी और कहा कि ज्योतिषी से इनकी कुंडली दिखवा लाओ जिससे गुणवती के विवाह की बात आगे चले। 

ज्योतिषी को कन्या की कुण्डली दिखाई, उसने बताया कि विवाह होते ही कन्या विधवा हो जाएगी। 

ज्योतिषी की यह बात जब ब्राह्मण परिवार को मालूम हुआ तो वह बहुत दुखी हो गया और इसका उपाय पूछा।


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ज्योतिषी ने बताया कि, हे ब्राह्मण सिंहल द्वीप में एक पतिव्रता महिला रहती है जिसका नाम सोमा धोबिन है, यदि कन्या की शादी से पहले सोमा आपके घर आकर पूजन करे और अपना आशीर्वाद दे तो यह दोष दूर हो जाएगा। 

ब्राह्मण ने अपनी पुत्री गुणवती को अपने सबसे छोटे पुत्र के साथ सिंहलद्वीप भेज दिया। 

दोनों भाई बहन सागर किनारे पहुंचकर उसे पार करने के बारे में विचार करने लगे। 

जब समुद्र को पार करने का कोई रास्ता नहीं मिला तो दोनों भूखे प्यासे एक पीपल वृक्ष के नीचे आराम करने लगे। 

पेड़ पर घोसले में एक गिद्ध का परिवार रहता था। 

उस समय घोसले में सिर्फ गिद्ध के बच्चे थे, वे सुबह से भाई बहन की बातों और क्रियाकलापों को देख रहे थे।


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शाम के समय जब गिद्ध की माता बच्चों के लिए भोजन लेकर घोसले में आई तो बच्चों ने पेड़ के नीचे लेटे भाई बहन की कहानी माता को बताई। 

उनकी बातें सुनकर गिद्ध की माता को दोनों भाई बहनों दया आई और बच्चों के कहने से उसने कहा कि तुम लोग अब चिंता मत करो मैं इन्हें सागर पार करवा दूंगी। 

बच्चों ने माता की बातों को सुनकर खुशी खुशी भोजन ग्रहण किया। 

गिद्ध की माता बच्चों को भोजन करवाकर दोनों भाई बहनों के पास आई और बोली कि मैंने आपकी समस्याओं को जान लिया है। 

आप चिंता मत कीजिए आपकी समस्या का निदान मैं कर दूंगी और आपको सोमा धोबन के पास पहुंचा दूंगी। 

गिद्ध की बातों को सुनकर दोनों भाई बहनों का मन आनंदित हो गया और उन्होने वन में मौजूद कंद मूल को खाकर रात काट ली। 


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सुबह होते ही गिद्ध ने दोनों भाई बहनों को समुद्र पार करवा दिया और सिंहलद्वीप में सोमा धोबिन के घर के पास पहुंचा दिया।

गुणवती सोमा धोबन के घर के पास छुपकर रहने लगी। 

हर दिन सुबह होने से पहले गुणवती सोमा का घर लीप दिया करती थी। 

एक दिन सोमा ने अपनी बहुओं से पूछा कि प्रतिदिन सुबह हमारा घर कौन लीपता है।

बहुओं ने प्रशंसा के लोभ से कहा कि हमारे अलावा यह काम और कौन करेगा। 


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लेकिन सोमा को बहुओं की बातों पर भरोसा नहीं हुआ और वह यह जानने के लिए पूरी रात जागती रही कि कौन है जो हर दिन सूर्योदय से पहले घर लीप जाता है। 

सोमा ने देखा कि, एक कन्या उसके आंगन में आई और आंगन लीपने लगी। 

सोमा गुणवती के पास आई और उससे पूछने लगी कि तुम कौन हो और क्यों हर सुबह मेरे आंगन को लीपकर चली जाती हो। 

गुणवती ने तब अपना सारा हाल सोमा से कह डाला। 

गुणवती के बातों को सुनकर सोमा ने कहा कि, तुम्हारे सुहाग के लिए मैं तुम्हारे साथ चलूंगी।




सोमा ने ब्राह्मण के घर आकर पूजा किया, लेकिन विधि का विधान कौन टाल सकता है। 

गुणवती का विवाह होते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। तब सोमा ने अपने सभी पुण्य गुणवती को दान कर दिया। 

सोमा के पुण्य से गुणवती का पति जीवित हो गया। 

लेकिन पुण्यों की कमी से सोमा के पति और बेटे की मृत्यु हो गई। 


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लेकिन सोमा ने अपना घर छोड़ने से पहले बहुओं से कह दिया था कि मेरे लौटने से पहले अगर मेरे पति और बेटों को कुछ होता है तो उनके शरीर को संभलकर रखना। 

बहुओं ने सास की आज्ञा को मानकर सभी के शरीर को संभलकर रखा। 

उधर सोमा ने सिंहलद्वीप लौटते हुए रास्ते में पीपल के वृक्ष की छाया में विष्णुजी की पूजा कर 108 बार पीपल की परिक्रमा की। 

इसके पुण्य के प्रभाव से सोमा के घर लौटते ही उसके पति और बेटे फिर से जीवित हो गए।

इस लिए मौनी अमावस्या के व्रत करने वाले व्रतियों को यह कथा सुनकर पीपल की 108 बार परिक्रमा करनी चाहिए। 

और भगवान विष्णु सहित शिवजी की पूजा भी करनी चाहिए।


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मौनी अमावस्या व्रत के लाभ :

माघ मास में तिल, ऊनी वस्त्र, घी का दिन बहुत ही पुण्यदायी होता है। 

इस लिए मौनी अमावस्या पर इन वस्तुओं का दान जरूर करना चाहिए। 

यह जरूरी नहीं कि आप बहुत दान करें लेकिन अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार थोड़ा दान भी आप कर सकते हैं। 

इस से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति मृत्यु पश्चात उत्तम लोक में स्थान पाता है। 

व्यक्ति मुनि पद को प्राप्त करता है। 

एक मान्यता है कि मौनी अमावस्या के दिन मनुष्यों के धरती पर लाने वाले प्रथम मनुष्य मनु ऋषि का जन्म हुआ था। 

मनु ऋषि के नाम से भी इस व्रत का नाम मौनी अमावस्या है।

 || महर्षि मनु सतरूपाजी की जय हो ||


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चंद्रमा का विभिन्न भावों में फल, दोष और निवारण :


चन्द्र का पहले भाव में फल :


सामान्य तौर पर कुण्डली का पहला घर मंगल और सूर्य के प्रभाव के अंतर्गत आता है....! 

जब चंद्रमा यहां स्थित हो तो यह भाव मंगल, सूर्य और चंद्रमा के संयुक्त प्रभाव में होगा...! 

ये तीनों आपस में मित्र हैं और तीनो यहां की स्थिति के अनुसार परिणाम देंगे...! 

सूर्य और मंगल इस घर में स्थित चंद्रमा को पूर्ण सहयोग देंगे...! 

ऐसा जातक रहमदिल होगा और उसके भीतर उसकी मां के सभी लक्षण और गुण मौजूद होंगे...! 

वह या तो भाइयों में बडा होगा या फिर उसके साथ ऐसा बर्ताव किया जाता होगा...! 


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जातक पर उसकी मां का आशिर्वाद हमेशा रहता है साथ ही वह अपनी मां को प्रसन्न रखता है ऐसा करने से वह उन्नति करता है और उसे हर प्रकार से समृद्धि मिलती है....! 

बुध से सम्बंधित चीजें और रिश्तेदार जैसे साली और हरा रंग आदि जो चंद्रमा के लिए हानिकार है...! 

जातक के लिए भी प्रतिकूल प्रभाव साबित होगें इस लिए बेहतर है उन लोगों से दूर रहें...! 


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दूध से खोया बनाना या लाभ के लिए दूध बेचना आदि कृत्य पहले भाव में स्थित चंद्रमा को कमजोर करते हैं...! 

इस का मतलब यदि जातक स्वयं भी इस प्रकार के कामों सें संलग्न होता है तो जातक का जीवन और सम्पत्ति नष्ट होने लगती है....! 

ऐसे में जातक को दूध और पानी मुफ्त में बांटना चाहिए इससे आयु बढती और चारो ओर से समृद्धि आती है...! 

ऐसा करने से जातक को 90 साल की दीर्घायु मिलती है और उसे सरकार से सम्मान और प्रसिद्धि मिलती है...! 


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चन्द्र का दूसरे भाव में फल :


दूसरे भाव चंद्रमा स्थित होने पर वह भाव बृहस्पति, शुक्र और चंद्रमा के प्रभाव में होगा....! 

क्योंकि दूसरा घर बृहस्पति का पक्का घर होता है और दूसरी राशि बृषभ का स्वामी शुक्र होता है...! 

यहां स्थित चंद्रमा बहुत अच्छे परिणाम देता है. चंद्रमा इस घर में बहुत मजबूत हो जाता है क्योंकि...! 

उसे शुक्र के खिलाफ बृहस्पति का अनुकूल समर्थन मिल जाता है इस कारण यहां का चंद्रमा अच्छे परिणाम देता है...! 

ऐसे में जातक के बहनें नहीं होतीं लेकिन निश्चित रूप से भाइयों की प्राप्ति होती है...! 

लेकिन यदि ऐसा नहीं होता तो जातक की पत्नी के भाई अवश्य होते हैं...! 

जातक को पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा जरूर मिलता है...! 


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ग्रहों की स्थिति जो भी हो लेकिन यहां स्थित चंद्रमा जातक के वंश को जरूर बढाता है...! 

जातक अच्छी शिक्षा प्राप्त करता है जिससे उसके भाग्योदय में सहयोग मिलता है...! 

चंद्रमा की चीजों से जुड़े व्यवसाय लाभप्रद साबित होंगे...! 

जातक एक प्रतिष्ठित शिक्षक भी हो सकता है...! 

बारहवें भाव में स्थित केतू यहां के चंद्रमा को ग्रहण लगाने वाला रहेगा जो जातक को अच्छी शिक्षा या पुत्र से वंचित कर सकता है...! 


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चन्द्र का तीसरे भाव में फल :


तीसरे भाव में स्थित चंद्रमा पर मंगल और बुध का भी प्रभाव होता है। 

यहां स्थित चंद्रमा लंबा जीवन और अत्यधिक धन देने वाला होता है। 

तीसरे भाव में स्थित चंद्रमा के कारण यदि नवमें और ग्यारहवें घर में कोई ग्रह न हों तो मंगल और शुक्र अच्छे परिणाम देंगें...! 

जातक शिक्षा और सीखने की प्रगति के साथ, जातक के पिता की अर्थिक स्थिति खराब होगी लेकिन इससे जातक की शिक्षा और सीखने की प्रगति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडेगा...! 


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यदि केतु कुण्डली में किसी शुभ जगह पर है और चंद्रमा पर कोई दुश्प्रभाव नहीं डाल रहा है तो जातक की शिक्षा अच्छे परिणाम देने वाली और हर तरीके में फायदेमंद साबित होगी...! 

यदि चंद्रमा हानिकर है...! 

तो यह बडी धनहानि और खर्चे का कारण हो सकता है यह घटना नवमें भाव में बैठे ग्रह की दशा या उम्र में हो सकती है...! 


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चन्द्र का चौथे भाव में फल :


चौथे भाव में स्थित चंद्रमा पर केवल चंद्रमा का ही पूर्णरूपेण प्रभाव होता है क्योंकि वह चौथे भाव और चौथी राशि दोनो का स्वामी होता है...! 

यहां चन्द्रमा हर प्रकार से बहुत मजबूत और शक्तिशाली हो जाता है...! 

चंद्रमा से संबन्धित वस्तुएं जातक के लिए बहुत फायदेमंद साबित होती हैं...! 

मेहमानों को पानी की के स्थान पर दूध भेंट करें. मां या मां के जैसी स्त्रियों का पांव छूकर आशिर्वाद लें. चौथा भाव आमदनी की नदी है जो व्यय बढानें के लिए जारी रहेगी...! 

दूसरे शब्दों में खर्चे आमदनी को बढाएंगे. जातक प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति होने के साथ - साथ नरम दिल और सभी प्रकार से धनी होगा...! 


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जातक को अपनी माँ के सभी लक्षण और गुण विरासत में मिलेंगे और वह जीवन की समस्याओं का सामना किसी शेर की तरह साहसपूर्वक करेगा...! 

जातक सरकार से सहयोग और सम्मान प्राप्त करेगा साथ में वह दूसरों को शांति और आश्रय प्रदान करेगा...! 

जातक निश्चित तौर पर अच्छी शिक्षा प्राप्त करेगा...! 

यदि बृहस्पति 6 भाव में हो और चंद्रमा चौथे भाव में तो जातक को पैतृक व्यवसाय फायदा देगा....! 

यदि जातक के पास कोई अपना कीमती सामान गिरवी रख जाएगा तो वह उसे मांगने के लिए कभी नहीं आएगा...! 

यदि चंद्रमा चौथे भाव में चार ग्रहों के साथ हो तो जातक आर्थिक रूप से बहुत मजबूत और अमीर होगा...! 

पुरुष ग्रह जातक की मदद पुत्र की तरह करेंगे और स्त्री ग्रह पुत्रियों की तरह...!


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चन्द्र का पांचवें भाव में फल :


पांचवें भाव में स्थित चंद्रमा के परिणाम में सूर्य, केतू और चंद्रमा का प्रभाव रहेगा...! 

जातक हमेशा सही तरीके से पैसा कमाने की कोशिश करेगा, वह कभी भी गलत तरीके नहीं अपनाएगा...! 

वह व्यापार में तो अच्छा नहीं कर पाएगा लेकिन निश्चित रूप से सरकार की ओर से सम्मान और सहयोग प्राप्त करेगा...! 

उसके द्वारा समर्थित कोई भी जीत जाएगा...! 

यदि केतू सही स्थान पर बैठा है और फायदेमंद है तो जातक के पांच पुत्र होंगें चाहे चंद्रमा किसी अशुभ ग्रह के प्रभाव में ही क्यों न हो....! 


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अपनी शिक्षा और सीख के कारण जातक दूसरों के कल्याण के लिए अनेक उपाय करेगा लेकिन दूसरे उसके लिए अच्छा नहीं करेंगे...! 

अगर जातक लालची और स्वार्थी हो जाता है तो वह नष्ट हो जाएगा. यदि जातक अपनी योजनाओं को एक गुप्त रखने में विफल रहता है...! 

उसके अपने ही लोग उसे नुकसान पहुंचाएंगे...! 


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चन्द्र का छठें भाव में फल :


यह भाव बुध और केतु से प्रभावित होता है। 

इस घर में स्थित चंद्रमा दूसरे, आठवे, बारहवें और चौथे घरों में बैठे ग्रहों से प्रभावित होता है...! 

ऐसा जातक बाधाओं के साथ शिक्षा प्राप्त करता है और अपनी शैक्षिक उपलब्धियों का लाभ उठाने के लिए उसे बहुत संघर्ष करना पडता है...! 

यदि चंद्रमा छठवें, दूसरे, चौथे, आठवें और बारहवें घर में होता है तो यह शुभ भी होता है ऐसा जातक किसी मरते हुए के मुंह में पानी की कुछ बूंदें डालकर उसे जीवित करने का काम करता है...! 

यदि छठवें भाव में स्थित चंद्रमा अशुभ है और बुध दूसरे या बारहवें भाव में स्थित है तो जातक में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति पाई जाएगी...! 

ठीक इसी तरह यदि चन्द्रमा अशुभ है और सूर्य बारहवें घर में है तो जातक या उसकी पत्नी या दोनो ही आंख के रोग या परेशानियों से ग्रस्त होंगे...! 


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चन्द्र का सातवें भाव में फल :


सातवां घर शुक्र और बुध से संबंधित होता है...! 

जब चंद्रमा इस भाव में स्थित होता है तो परिणाम शुक्र, बुध और चंद्रमा से प्रभावित होता है...! 

शुक्र और बुध मिलकर सूर्य का प्रभाव देते हैं...! 

पहला भाव सातवें को देखता है नतीजन पहले घर से सूर्य की किरणे सातवें भाव में बैठे चंद्रमा को सकारात्म रूप से प्रभावित करती हैं जिसका मतलब है कि चंद्रमा से संबंधित चीजों और रिश्तेदारों लाभकारी और अच्छे परिणाम मिलेंगे...! 


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शैक्षिक उपलब्धियां पैसा या धन कमाने के लिए उपयोगी साबित होंगी...! 

उसके पास जमीन जायदाद हो या न हो लेकिन उसके पास नकद निश्चित रूप से हमेशा रहेगा...! 

उसके पास कवि या ज्योतिषी बनने की अच्छी योग्यता होगी....! 

अथवा वह चरित्रहीन हो सकता है और रहस्यवाद और अध्यात्मवाद को बहुत चाहता होगा...! 

सातवें भाव में स्थित चंद्रमा जातक की पत्नी और मां के बीच अर्थ संघर्ष देता है जो दूध के व्यवसाय में प्रतिकूल प्रभावी होता है...! 

ऐसे में जातक अगर मां का कहना नहीं मानता तो उसे तनाव और परेशानियों का सामना करना पडता है...!


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चन्द्र का आठवें भाव में फल :


यह भाव मंगल और शनि के अंतर्गत आता है...! 

यहां पर स्थित चंद्रमा जातक की शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है...! 

लेकिन यदि शिक्षा अच्छी है तो जातक की मां का जीवन छोटा होता है...! 

लेकिन अक्सर यही देखने को मिलता है कि जातक शिक्षा और मां को खो देता है...! 

हालांकि, यदि बृहस्पति और शनि दूसरे भाव में हों तो सातवें घर में बैठे चंद्रमा का बुरा कम हो जाएगा...! 

इस भाव में स्थित चन्द्रमा जातक को पैतृद सम्पत्ति से वंचित करता है...! 

यदि जातक की पैतृक सम्पत्ति के पास कोई कुंआ या तालाब होता है तो जातक के जीवन में चंद्रमा के प्रतिकूल परिणाम देखने को मिलते हैं...!


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चन्द्र का नौवें भाव में फल :


नौवां घर बृहस्पति, से सम्बंधित होता है जो चंद्रमा का परममित्र है...! 

इस लिए जातक इन दोनों ग्रहों के लक्षण और सुविधाओं को आत्मसात करता है...! 

साथ ही अच्छे आचरण, कोमक हृदय, मन से धार्मिक, और धार्मिक कृत्यों तथा तीर्थयात्राओं से प्रेम करने वाला होता है....! 

वह 75 वर्षों तक जीवित रहता है. पाचवें घर में स्थित शुभ ग्रह संतान सुख में वृद्धि और धार्मिक कामों में गहन रुचि विकसित करता है...! 

तीसरे भाव में स्थित मित्र ग्रह पैसे और धन में काफी वृद्धि करता है...!


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चन्द्र का दसवें भाव में फल : 


दसवां घर हर तरीके में शनि द्वारा शासित है. यह घर चौथे घर के द्वारा देखा जाता है, जो चंद्रमा द्वारा शासित होता है....! 


इस लिए इस घर में स्थित चंद्रमा जातक को 90 साल की लंबी आयु सुनिश्चित करता है...! 


चंद्रमा और शनि आपस में शत्रु हैं इस लिए, तरल रूप में दवाओं का सेवन जातक को हमेशा हानिकारक साबित होंगी...! 


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रात में दूध का सेवन जहर के समान कार्य करता है. यदि जातक चिकित्सक है तो उसके द्वारा रोगी को दी जाने वाली दवाएं यदि शुष्क हों तो मरीज पर इलाज का जादुई प्रभाव पड़ेगा. यदि जातक सर्जन है तो वह सर्जरी के माध्यम से वह महान धन और प्रसिद्धि अर्जित करेगा...! 


यदि दूसरा और चौथा भाव खाली हो तो जातक पर पैसों की बरसात होगी. यदि शनि पहले भाव में स्थित हो तो विपरीत लिंगी के कारण जातक का विनाश हो जाता है....! 


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विशेषकर विधवा जातक के विनाश का कारण बनती है....! 


शनि से संबंधित वस्तुएं और व्यवसाय जातक के लिए फायदेमंद साबित होगा...!


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चन्द्र का ग्यारहवें भाव में फल :


यह घर बृहस्पति और शनि से पूरी तरह प्रभावित होता है. इस घर में स्थित हर ग्रह अपने शत्रु ग्रहों और उनके साथ जुडी बातों को नष्ट कर देता है....! 


इस प्रकार यहां स्थित चंद्रमा अपने शत्रु केतू की चीजों को नष्ट कर देता है जैसे जातक के बेटे आदि को. यहां चंद्रमा को अपने शत्रुओं शनि और केतू की संयुक्त शक्ति का सामना करना पडता है...! 


जिससे चंद्रमा कमजोर होता है...! 


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ऐसे में यदि केतू चौथे भाव में स्थित है तो जातक की मां का जीवन खतरे में पडेगा...! 


बुध से जुडे व्यापार भी हानिप्रद साबित होंगे....! 


शनिवार के दिन से घर का निर्माण या घर की खरीदी चंद्रमा के शत्रु को बलवान बनाते हैं जो जातक के लिए विनाशकारी साबित होगा....! 


आधी रात के बाद कन्यादान और शुक्रवार के दिन किसी भी शादी समारोह में शामिल होना जातक के भाग्य को नुकसान पहुंचाएगा...!


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चन्द्र का बारहवें भाव में फल :


यह घर चंद्रमा के मित्र बृहस्पति का है. यहां स्थित चंद्रमा मंगल और मंगल से संबंधित चीजों पर अच्छा प्रभाव डालता है....! 


लेकिन यह अपने दुश्मन बुध और केतु तथा उनसे संबंधित चीजों को नुकसान पहुंचाएगा...! 


इस लिए मंगल जिस भाव में बैठा है उससे जुडा व्यापार और चीजें जातक के लिए अत्यधिक लाभकारी रहेंगी...! 


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ठीक इसी तरह बुध और केतू जिस घर में बैठे हैं....! 


उससे जुडा व्यापार और चीजें जातक के लिए अत्यधिक हानिकारक रहेंगी...! 


बारहवें घर में स्थित चंद्रमा जातक के मन में अप्रत्याशित मुसीबतों और खतरों को लेकर एक साधारण सा डर पैदा करता है....! 


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जिससे जातक की नींद और मानसिक शांति भंग होती है...! 


यदि चौथे भाव में स्थित केतू कमजोर और पीडित हो तो जातक के पुत्र और मां पर प्रतिकूल असर पडता है...!


शुभ चन्द्र व्यक्ति को धनवान और दयालु बनाता है। 


सुख और शांति देता है। 


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भूमि और भवन के मालिक चन्द्रमा से चतुर्थ में शुभ ग्रह होने पर घर संबंधी शुभ फल मिलते हैं।क्या न करें :-


ज्योतिषशास्त्र में जो उपाय बताए गये हैं उसके अनुसार चन्द्रमा कमज़ोर अथवा पीड़ित होने पर व्यक्ति को रात्रि में दूध नहीं पीना चाहिए. सफ़ेद वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए और चन्द्रमा से सम्बन्धित रत्न नहीं पहनना चाहिए।


जन्म कुंडली मे अरिष्ट चंद्र शांति हेतु विशिष्ट उपाय :


जन्म कुंडली मे यदि चंद्रमा अशुभ भावो 2, 6, 8, या 12 में नीच राशिस्थ हो अथवा शत्रु राशि ग्रह से युत या दृष्ट हो तो चंद्रमा जातक/जातिका को धन, परिवार, माता आदि के संबंद में अशुभ फल प्रदान करता है। 


इस स्थिति में जातको को बुध, शनि, राहु, केतु की महादशा/अंतर्दशा में मध्य अनिष्ट फल प्राप्त होते है। 


नीचे दिए शास्त्रोक्त उपाय करने से चंद्र अरिष्ट की शांति कर शुभ फल प्रदान करता है।


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चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष प्रथम सोमवार से आरम्भ कर 16 अथवा 54 सोमवार विधि पूर्वक व्रत कर शिव - पार्वती का पूजन कर समाप्ति के दिन पांच छोटी कन्याओं को भोजन कराने से अरिष्ट शांति होती है।


कुंडली मे चंद्र यदि कर्क या वृष राशि का हो तो भगवती गौरी का पूजन करना शुभ होता है। 


स्वास्थ्य अथवा त्रिविध तापों की अरिष्ट शांति के लिए यथा सामर्थ्य महामृत्युंजय मंत्र का जाप एवं दशांश हवन और अमोघ शिवकवच का पाठ करना शुभ होता है।


यदि चंद्रमा केतु के साथ अथवा चंद्र शनि की युति हो तो श्री गणेश जी की पूजन व गणेश सहस्त्रनाम से उपासना करनी चाहिए।


चंद्रमा यदि बुध युक्त एवं स्त्री राशि मे हो तो श्री दुर्गा शप्तशती का पाठ कल्याणकारी रहता है।


विवाहादि कार्यो में चंद्र - राहु आदि ग्रहों का अशुभ प्रभाव हो तो शिव पार्वती पूजन एवं पूर्णिमा का व्रत करना चाहिए।


सोमवार और पूर्णिमा को प्रातः काल स्नानादि कर चांदी के बर्तन में कच्ची लस्सी दूध गंगाजल युक्त की धारा शिवलिंग पर मंत्र पूर्वक चढ़ाना चाहिए।


प्रत्येक सोमवार को बबूल वृक्ष को भी दूध से सींचना लाभदायक रहता है।


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चंद्र यदि संतान संबंधित अरिष्ट कर रहा हो तो शिवजी की आराधना मंत्र जप हवन करना शुभ होता है।


पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय के समय चांदी अथवा तांबे के बर्तन में मधुमिश्रित पकवान यदि चंद्र को अर्पित किए जाए तो इनकी तृप्ति होती है।


पूर्णमाशी के दिन चांदी का कड़ा चांदी की चैन प्रतिष्ठा के बाद धारण करनी लाभदायी रहती है।


स्त्रियों को मोती की माला सोमवार के दिन जब स्वाति नक्षत्र पड़े प्रतिष्ठा कर गले मे धारण करने से अरिष्ट फलो की शांति होती है।


बारह वर्ष तक कि आयु के बालको की स्वास्थ्य रक्षा के लिए चांदी के गोल सिक्के पर चंद्र बीज मंत्र "ॐ श्रां श्री°श्रौ° सः चन्द्रमसे नमः" लिखवाकर इसी मंत्र से अभिमंत्रित कर प्रतिष्ठा पूर्वक गले मे धारण करना शुभ रहता है।


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मानसिक व शारीरिक व्याधियों की शान्ति के लिए शरद पूर्णिमा की रात बादाम मेवा युक्त खीर चाँद की रौशनी में रखे अगले दिन सुबह भगवान को भोग लाग कर तथा ब्राह्मण को खिलाने के बाद स्वयं सेवन करने से अनेक रोगों की शांति होती है।


चंद्र की महादशा में शुक्र अथवा सूर्य की अंतर्दशा में क्रमशः रूद्र्राभिषेक तथा शिव पूजन व श्वेत वस्त्र खीर आदि दान करने से लाभ होता है।


क्षीरणी ( खिरनी ) की जड़ सोमवार रोहिणी नक्षत्र में सफेद धागे में चंद्र मंत्र से अभिमंत्रित करके धारण करने से विशेष शांति होती है।


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प्रतिदिन सफेद गौ को मीठी रोटी एवं हरा चारा खिलाये।


छोटे बच्चों को कुंडली मे चंद्र अशुभ होने पर उन्हें कैल्शियम का सेवन कराए शुभ रहेगा।


चंद्र अशुभ ग्रहों राहु - शनि आदि से आक्रांत होकर अशुभ स्थानों  6 , 8 , 12 वे में हो तो दूध, दही, खोया, पनीर एवं अन्य श्वेत वस्तुओं का व्यवसाय न करें।


स्वास्थ्य अथवा मानसिक परेशानी होने पर जातक/जातिका चांदी के पात्र में ही जल का सेवन करें।


यदि कुंडली मे चंद्र - केतु का अशुभ योग 6, 8, या 12 भाव मे हो तो जातको को हरा वस्त्र, केले, साबुत मूंग, हरा पेठा आदि का दान करना चाहिए।


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चंद्र यदि व्यवसाय में हानि कर रहा हो तो जातक/जातिका को चंद्रग्रहण के समय आटा, चांवल, चीनी, गुड़, सूखा नारियल, सफेद तिल एवं सतनाजा आदि का दान करना चाहिए तथा ग्रहण काल मे चंद्र के बीज मंत्र का यथा सामर्थ्य जप करना लाभकारी होता है।


चंद्र यदि संतान सुख में बाधक हो तो रात्रि काल के समय दूध एवं पानी मे सोने की सलाई गर्म कर बुझाकर पति/पत्नी दोनों को पीना शुभ होगा।

पंडारामा प्रभु राज्यगुरू 

( द्रविड़ ब्राह्मण )

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!!!!! शुभमस्तु !!!


🙏हर हर महादेव हर...!!


जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏


पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -

श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,

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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

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सन् 2026 में राशि / गुरु की महादशा :

सन् 2026 में राशि / गुरु की महादशा : बुध ने मकर राशि में किया प्रवेश, मेष राशि के लोगों को मिल सकता है नौकरी में लाभ :  वैदिक ज्योतिष शास्त्...